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"निवृत्तिपरक भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण तत्त्व संन्यासी ही है। बिना संन्यास और संन्यासी को समझे भारतीय संस्कृति को समझने का कोई भी प्रयास व्यर्थ है। आधुनिक विद्वानों ने कुछ ऐसा वातावरण बना दिया कि, भगवा उसका बाह्य स्वरूप, ही संन्यास और संन्यासी का एकमात्र परिचय रह गया है। किसी भी संस्था की विवेचना करते हुए अगर हमारे संदर्भ बिंदु केवल हम क्या चाहते, समझते और देखते हैं, यही रहते हैं तो ऐसी विवेचना का कोई मूल्य नहीं है।
संन्यासी किस प्रेरणा से गेरुआ धारण करते हैं, उनका क्या लक्ष्य होता है, उनके लक्ष्य के पीछे क्या दर्शन होता है, लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह क्या प्रयास करते हैं और शेष समाज के प्रति वह क्या भाव रखते हैं- यह सब उपेक्षित रह जाएगा। इस पुस्तक में एक साधारण भारतीय की दृष्टि से संन्यासी और संन्यास नाम की संस्था को देखने का विनम्र प्रयास है। इसमें लेखिका ने यह जानने का प्रयास किया है कि एक संन्यासी के जीवन में बाह्य स्वरूप से इतर और क्या होता है।"