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"सदियों का अभिशाप समाप्त हुआ और 21वीं सदी के महान् नायक के करकमलों से श्रीराम मंदिर का उद्घाटन हुआ, जिसके हम सब अपने-अपने घर में साक्षी बने। यह एक ऐसी घटना थी, जिसने सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि मेरे पूर्वजों की भी अधूरी इच्छा को पूर्ण किया और मैं खुद इसकी साक्षी बनी तथा मेरे जैसे ही आप सब भी इस विशिष्ट घटनाक्रम के साक्षी बने। कितनी खूबसूरत बात है कि भाग-3 और भाग-2 के बीच में बहुत ही अल्प अवधि रही। यह सब आप सबके सामूहिक प्रयासों की वजह से ही हो सका; और हाँ, रामलला के आशीर्वाद के बिना तो वैसे भी कुछ नहीं होता है। इसलिए मुझे उम्मीद है कि रामलला का आशीर्वाद एवं आप सबका सामूहिक प्रयास हमें मिलता रहेगा और हम मध्यम गति से इसी तरीके से आगे बढ़ते रहेंगे।
भारतीय संस्कृति का जो रूप गलत तरीके से परोसा गया है, उस भारतीय संस्कृति के सही रूप को और श्रीराम को आने वाली पीढ़ियाँ मन में अपने-अपने तरीके से स्थापित कर सकें। आप अपने विचारों को इसी तरीके से काव्य-श्रृंखला में रखते रहिए। मुझे पूरी उम्मीद है कि रामलला हमें आशीर्वाद देंगे और हम इस मुहिम को, इस श्रृंखला को आगे बढ़ा सकेंगे।"