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कभी पति के लिए अपने प्राणों की परवाह न करने वाली महारानी कैकेयी पुत्रप्रेम में अपने पति के प्राणों की परवाह ही नहीं कर रही थी। ज्ञात होने पर भी कि श्रीराम का वियोग महाराज दशरथ के प्राणों की आहुति ले लेगा, अपने निश्चय पर अटल थी? अथवा सत्य कुछ अन्य था। वैसे भी संसार में अमर कौन हुआ है? जो संसार में आता है, उसे संसार त्यागना ही होता है। अमर तो वही होते हैं जो यश रूपी शरीर से जीते हैं। जीवित रहते कोई अमर नहीं होता है, पर प्रेम में प्राण त्यागने वालों को हमेशा याद रखा जाता है। यहाँ प्रेम शब्द का भी व्यापक अर्थ है, जो पिता, माता, भाई, पत्नी, पति, देश, समाज और मानवता जैसे अनेक रूपों में अपना अस्तित्व प्रकट करता है।
जिस दिन से कैकेयी अवध की रानी बनकर अयोध्या में आई थीं, उस दिन से आज तक उन्हें अयोध्या में भरपूर सम्मान मिला था। पति के भरपूर प्रेम के साथ-साथ प्रजा का उन्हें पूर्ण समर्थन था, पर वरदान माँगने के बाद उन्होंने अपना सारा सम्मान खो दिया। एक तरफ पति ने उन्हें लगातार उलाहना दिया। दूसरी तरफ प्रजावर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले महामंत्री सुमंत्र ने भी सार्वजनिक रूप से कैकेयी माता की कथा सुनाकर उनकी निंदा की।
- इसी पुस्तक से
इस उपन्यास के प्रणयन का उद्देश्य माता कैकेयी के विषय में व्याप्त धारणा का खंडन करना है। रामायण में प्रभु श्रीराम के सभी परिजनों ने महान् त्याग का परिचय दिया था। पर माता कैकेयी का त्याग तो अपार था, जिन्होंने श्रीराम की नरलीला को सफल बनाने के लिए अपयश को वरण किया।