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"""नमस्ते बेटा!""
""और कैसे हो पापा!""
""टनाटन"" अरे मैडम, निक्की का फोन है।""
आज भी यह वाक्य कानों में गूँजता है।
'द लास्ट ब्रेकफास्ट' (पापा के साथ)
कुछ किताबें पढ़ने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए होती हैं। यह पुस्तक उन्हीं में से एक है।
इस पुस्तक में-आप पाएँगे छोटी-छोटी यादें, अनगिनत सीखें, पिता के साथ बिताए अनमोल पल, और उस दर्द की गहराई जिसे शब्दों में पिरो पाना आसान नहीं।
यह सिर्फ शोक की कहानी नहीं-यह पुनर्जीवन की कहानी है।
कैसे एक बेटी अपने बिखरे हुए दिल को जोड़कर पिता की विरासत को अपने भीतर जगाती है।
इस पुस्तक का मूल संदेश है-पिता जाते नहीं, वे बस दिखाई देना बंद कर देते हैं। वे हमारे भीतर जीने लगते हैं।
यह पुस्तक हर उस दिल के लिए है, जिसने अपने किसी प्रिय को खोया है और फिर भी उनसे टूटे बिना प्यार करना सीखा है।
- स्वेता परमार"