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अंतिम निष्कर्ष के रूप में यही देखता हूँ कि दोनों जीवन अर्थात् विरक्त का हो अथवा गृहस्थ का, समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। । हम जो कर रहे होते हैं, वह हमें महत्त्वपूर्ण नहीं लगता; दूसरा पक्ष अधिक महत्त्व का लगता है, लेकिन समाज जीवन के लिए दोनों पक्ष अनिवार्य हैं। गृहस्थ रहते हुए समाज कार्य आसान नहीं है और सांसारिक आकर्षणों के बीच रहते हुए विरक्त रहकर समाज-कार्य करना कठिन होता है। एक तीसरा पक्ष भी होता है, जो बहुतायत में पाया जाता है; वह है, जो केवल जीने के लिए जीता है।
इसलिए महत्त्वपूर्ण है मनुष्य की भाँति जीवन जीना । मनुष्य कितना भी सुखोपभोग करे, फिर भी उसे संतुष्टि नहीं मिलती। संतुष्टि मिलती है दूसरे के लिए कुछ करने में, कोई सृजनात्मक काम करने में। यह संतुष्टि ही जीवन की सफलता है।
मनुष्य जीवन भर पद, प्रतिष्ठा, मान, सम्मान के लिए प्रयासरत ही नहीं रहता है, बल्कि कोई भी धतकर्म करने में संकोच नहीं करता। अकूत धन, सुखोपभोगी साधन एकत्र कर लेने के बाद भी मन में संतोष नहीं होता। कुछ पाने की इच्छा बनी ही रहती है।
श्री श्रीधर पराड़कर भारतीय साहित्य परिषद् से संबद्ध हैं।