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Deepshikha Sa Jeevan Hai   

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Author Jai Shankar Mishra
Features
  • ISBN : 9789351868514
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1
  • ...more

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  • Jai Shankar Mishra
  • 9789351868514
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1
  • 2016
  • 96
  • Hard Cover

Description

प्रस्तुत कविता-संग्रह ‘दीपशिखा सा जीवन है’ श्री जयशंकर मिश्र की काव्य-यात्रा का षष्ठम सोपान है। इसमें कुल 56 नवीन रचनाएँ सम्मिलित की गई हैं। इससे पूर्व की रचनाएँ ‘यह धूप-छाँव, यह आकर्षण’, ‘हो हिमालय नया, अब हो गंगा नई’, ‘चाँद सिरहाने रख’, ‘बाँह खोलो, उड़ो मुक्त आकाश में’ एवं ‘बस यही स्वप्न, बस यही लगन’ हिंदी साहित्य-जगत् में अत्यधिक रुचि, उल्लास एवं गंभीरता के साथ स्वीकार की गई हैं।
श्री मिश्र की कविताओं में भाषा की सहजता, सरलता एवं सुगमता के साथ ही अंतर्निहित पारिवारिक एवं सामाजिक समरसता की महत्ता, युग-मंगल की कामना, जीवन के उद्देश्यों के प्रति सतत चिंतन तथा परिवेश की विविध जटिलताओं के बावजूद मानव जीवन को सौंदर्यमय एवं शिवमय बनाने की बलवती भावना रचनाकार को एक विशिष्ट पहचान देती है। अनेक रचनाओं में प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों के प्रति रचनाकार की संवेदनशीलता तथा तादात्म्य स्थापित करने का रुझान भी प्रतिबिंबित होता है।
वर्तमान कविता-संग्रह के प्रति डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के निम्न उद्गार महत्त्वपूर्ण हैं—
‘‘मैंने श्री जयशंकर मिश्र की कविताएँ पढ़ीं। ये एक संवेदनशील चित्त की भावाभिव्यक्तियाँ हैं, जो सागर के, प्रकृति के, परिवेश और परिवार के संबंध में हैं। कविता अपने बुनियादी रूप में कवि की भावाभिव्यक्ति ही होती है। मिश्रजी ने अपनी रागात्मक संवेदनाओं को छंदोबद्ध रूप में प्रस्तुत किया है, जिनमें उनकी स्मृति और प्रीति, वेदना और उल्लास तथा आशा और मंगलकामना व्यक्त हुई है। आशा है, पाठक इनका स्वागत करेंगे।’’

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अनुक्रम

प्रस्तावना —Pgs 7

अपनी बात —Pgs 13

आभार —Pgs 17

1. दीपशिखा सा जीवन है —Pgs 23

2. मिट्टी के सही, पर दीप जलें —Pgs 24

3. अथ कहाँ से करूँ —Pgs 26

4. जीवन की दो विधाएँ —Pgs 28

5. गीत लिता रहा —Pgs 30

6. जीवन के सघन गहन वन में —Pgs 32

7. जगमग दीप जले —Pgs 33

8. प्रणय-गान ही गाना —Pgs 34

9. हिमगिरि सा मन —Pgs 36

10. राहें नई नित बनाते रहे —Pgs 37

11. रहता यों अतृप्त अनवरत —Pgs 38

12. जो अप्राप्त, यों भाता है —Pgs 40

13. पुलकित साँझ देहरी आई —Pgs 41

14. नया आयाम, नई राह —Pgs 42

15. किसने सतरंगी रंग भरे —Pgs 44

16. जो सहज प्राप्त वह अर्थहीन —Pgs 45

17. मीत भी साक्ष्य भी —Pgs 46

18. स्नेह-प्यार के इस आँगन में —Pgs 47

19. निशिवासर प्रवहमान —Pgs 48

20. तुम नहीं जानते हो प्रियवर —Pgs 50

21. जन-जन पर छाई तरुणाई —Pgs 52

22. नित नेह-पुष्प बिराऊँगा —Pgs 53

23. जब दिवस हो सफल —Pgs 54

24. शुचिता की प्रतिमूर्ति —Pgs 55

25. दीपों का उत्सव —Pgs 57

26. नव-शदों के गीत सुनाऊँ —Pgs 58

27. प्रीति ही सृष्टि का मूल आधार है —Pgs 59

28. धुँधली स्मृतियों का साक्षी —Pgs 60

29. पुलकित प्रमुदित जीवन-कानन —Pgs 62

30. नीलिमा-नीलिमा का यह अद्भुत मिलन —Pgs 63

31. साँझ का कुहासा —Pgs 64

32. नव विहान की बात करें —Pgs 65

33. निज तन-मन एकाकार करें —Pgs 66

34. नि:सृत होती हिम-शृंगों से —Pgs 67

35. आह्लाद की मूर्ति है —Pgs 68

36. प्रीति की अला जगाएँगे —Pgs 69

37. मन अनमना हो जाता है —Pgs 70

38. नव गगन चाहिए —Pgs 72

39. स्वामित्व त्याग उपभोग करें —Pgs 73

40. प्रीति के गीत गाते रहे —Pgs 74

41. दिन दूनी रात चौगुनी हो —Pgs 76

42.  श्रेय-प्रेय दोनों जीवन में —Pgs 77

43. मुझे मुत कर दो —Pgs 78

44. कभी जीत, कभी हार —Pgs 80

45. तुम तेज-पुंज हो शति-स्रोत —Pgs 81

46. वास्को डि गामा का अंतिम पड़ाव —Pgs 82

47. सागर तट का स्वर्णिम विहान —Pgs 84

48. परम ज्योति से दीप्तिमान —Pgs 85

49. हम कब पहचान पाते हैं —Pgs 86

50. अजब पहेली है जीवन —Pgs 88

51. ठहरो गतिमय जीवन! —Pgs 89

52. कौन टिकता है, कब सूर्य के सामने —Pgs 90

53. जाग्रत् जीवन —Pgs 91

54. तत्काल तिरोहित कर देती —Pgs 92

55. दिवस ईश-वंदन का —Pgs 93

56. किंचित् भी पश्चाप नहीं  —Pgs 94

 

The Author

Jai Shankar Mishra

श्री जय शंकर मिश्र एक अत्यंत लोकप्रिय एवं कुशल प्रशासनिक अधिकारी के साथ-साथ अत्यंत संवेदनशील व्यक्‍ति एवं रचनाकार के रूप में भी जाने जाते हैं। उत्तर प्रदेश शासन एवं भारत सरकार के अनेक महत्त्वपूर्ण तथा चुनौतीपूर्ण दायित्वों का अत्यंत सजगता, क्षमता एवं कुशलता से निर्वहन करने के साथ-साथ संस्कृति एवं साहित्य की अनेक विधाओं में श्री मिश्र की अत्यधिक अभिरुचि है।
विभिन्न भाषाओं में लिखे जा रहे साहित्य के पठन-पाठन के अतिरिक्‍त भारतीय वाड.मय, उपनिषदों एवं दार्शनिक ग्रंथों के अध्ययन में उनकी गहरी अभिरुचि है। पूर्व में प्रकाशित चार काव्य-संग्रहों के अतिरिक्‍त श्री मिश्र की अंग्रेजी भाषा में ‘ए क्वेस्ट फॉर ड्रीम सिटीज’, ‘महाकुंभ : द ग्रेटेस्ट शो ऑन अर्थ’, ‘हैप्पीनेस इज ए चॉइस चूज टू बी हैप्पी’ एवं इसका हिंदी भावानुवाद ‘24×7 आनंद ही आनंद’ आदि प्रकाशित हो चुकी हैं। ये रचनाएँ भी सुधी पाठकों द्वारा अत्यधिक अभिरुचि एवं आह्लाद के साथ स्वीकार की गई हैं।

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