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Achal Mera Koi   

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Author Vrindavan Lal Verma
Features
  • ISBN : 8173151318
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1st
  • ...more

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  • Vrindavan Lal Verma
  • 8173151318
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1st
  • 2011
  • 208
  • Hard Cover

Description

‘तो बतलाओ, तुम अचल, से कभी प्रेम करती थीं?’
‘कभी नहीं । और तुम? ’
‘हाँ करती थी । एक युग-सा हो गया । परंतु सुधाकर को और भी अधिक चाहा ।’
‘अचल के यहाँ या कहीं अकेली जाने पर सुधाकर बाबू कोई रोक-टोक तो नहीं करते? ’ 
निशा ने पूछा ।
कुंती ने जरा भन्नाकर उत्तर दिया, ‘रोक-टोक कैसे करेंगे? मैं कोई चोरी तो करती नहीं । मान लो मैं अचल को चाहने लगूँ तो उनका मार्ग अलग, मेरा अलग; परंतु जब तक वे अपने शरीर को और व अपने शरीर को पवित्र बनाए रहें तब तक किसी के मन से किसी को क्या वास्ता? ’
‘ शायद तुम्हारा कहना ठीक हो; परंतु हिंदू धर्म में तन और मन के बीच में कोई अंतर नहीं रखा गया है ।’ 
‘ केवल स्त्री के लिए । पुरुष के लिए सब धन बाईस पंसेरी । स्त्रियों ने शास्त्रों कोलिखा होता तो उनमें कुछ और मिलता । ’  
‘ सो तो ठीक है, कुंती । शायद पुरुषों की अपेक्षा अपना समाज स्त्रियों पर अधिक टिका हुआ है । पुरुष चाहे इस बात को माने और चाहे न माने, पर इन्हीं स्त्रियों को बहुत-से अपना शृंगार समझते हैं और अनेकों पैर की जूती । मुझको दोनों कल्पनाओं से घोर घृणा है ’
नारी स्वतंत्र होनी ही चाहिए । पर स्वतंत्रता और उच्छंखलता के भेद को भी समझा जाना चाहिए । आयातित आचरण से नारी-पुरुष समान हुए या नहीं-यह आज के लोग अच्छी तरह परिचित हैं । परंतु इस भविष्यत् को वर्माजी की दृष्टि ने पहले ही परख लिया था । वर्माजी की श्रेष्ठ कृतियों में से एक है ‘अचल मेरा कोई... ’ 

The Author

Vrindavan Lal Verma

मूर्द्धन्य उपन्यासकार श्री वृंदावनलाल वर्मा का जन्म 9 जनवरी, 1889 को मऊरानीपुर ( झाँसी) में एक कुलीन श्रीवास्तव कायस्थ परिवार में हुआ था । इतिहास के प्रति वर्माजी की रुचि बाल्यकाल से ही थी । अत: उन्होंने कानून की उच्च शिक्षा के साथ-साथ इतिहास, राजनीति, दर्शन, मनोविज्ञान, संगीत, मूर्तिकला तथा वास्तुकला का गहन अध्ययन किया ।
ऐतिहासिक उपन्यासों के कारण वर्माजी को सर्वाधिक ख्याति प्राप्‍त हुई । उन्होंने अपने उपन्यासों में इस तथ्य को झुठला दिया कि ' ऐतिहासिक उपन्यास में या तो इतिहास मर जाता है या उपन्यास ', बल्कि उन्होंने इतिहास और उपन्यास दोनों को एक नई दृष्‍ट‌ि प्रदान की ।
आपकी साहित्य सेवा के लिए भारत सरकार ने आपको ' पद‍्म भूषण ' की उपाधि से विभूषित किया, आगरा विश्‍वविद्यालय ने डी.लिट. की मानद् उपाधि प्रदान की । उन्हें ' सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार ' से भी सम्मानित किया गया तथा ' झाँसी की रानी ' पर भारत सरकार ने दो हजार रुपए का पुरस्कार प्रदान किया । इनके अतिरिक्‍त उनकी विभिन्न कृतियों के लिए विभिन्न संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानित व पुरस्कृत किया ।
वर्माजी के अधिकांश उपन्यासों का प्रमुख प्रांतीय भाषाओं के साथ- साथ अंग्रेजी, रूसी तथा चैक भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है । आपके उपन्यास ' झाँसी की रानी ' तथा ' मृगनयनी ' का फिल्मांकन भी हो चुका है ।

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