₹450
"वर्ष 1956-
गाँव जमरूदपुर पड़ी नींव पचपन खंभों और लाल दीवारों वाले शक्तिपीठ की !
सफर नहीं था आसान, मंजिल खड़ी थी दूर, राहों में कई दरिया और अग्नि भी भरपूर रण हो कोई या फिर रणभूमि हो कोई -
हम ही लहराती हैं, हर साल विजयपताका, रहेगी अजस्त्र यों ही इसकी यशोगाथा !
ये बुत, ये दरख्तें, ये ख्वाब, ये खताएँ, मैं हूँ वो इमारत, लिखी गई है जिस पर तालिम-ए-निस्बाँ की पहली-पहल इबारत ।
- कंचन वर्मा"