₹400
"प्रकृति को सर्वोपरि दिखाने हेतु लिखा गया यह उपन्यास सभी से अपनी जड़ों से जुड़ाव रखने हेतु किया गया अनुरोध है। इसमें दिखाए गए ग्रामीण-शहरी मिश्रित संस्कृति के पहलू-एक प्रयास है इस विस्मृत होती संस्कृति को सहेजकर रखने का, ताकि Gen Z इनके वास्तविक स्वरूप से परिचित होकर इनके प्रति गौरव का भाव रख सके। आम में खास के अन्वेषण को प्रेरित करता यह उपन्यास वास्तव में हिंदी भाषी क्षेत्रों के नवयुवकों में चल रहे अंतर्द्वद्व की मीमांसा है।
इस उपन्यास की विषयवस्तु एक ऐसे संक्रमण काल की साक्षी है- जब गाँव और शहर की सीमाएँ एक-दूसरे का अतिक्रमण कर चुकी हैं। मुख्यतः ब्रज-बुंदेलखंड क्षेत्र, जो चंबल-यमुना व इनकी सहायक नदियों का बेसिन है, को इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में रखा गया है। इस उपन्यास के माध्यम से भविष्य में होने वाली पर्यावरण की बदहाली व इससे आने वाले अस्तित्व के संकट को पलायन नामक सामाजिक समस्या से जोड़ा गया है। इसके समाधान के तौर पर घाटी की समृद्धि हेतु कथा के पात्रों को सच्चे प्रहरी के तौर पर उकेरा गया है। अपनी जन्मभूमि की खुशहाली को इस कथा में जीवन के सर्वोपरि लक्ष्य के रूप में दिखाया गया है। उपन्यास पाठकों को उस दिन के बारे में याद दिलाना चाहता है जब पाठकों ने पहली बार घर छोड़ा था।"