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"प्रस्तुत पुस्तक 'सि(हि)न्ध का संघर्ष' व्यक्तिगत क्षति और एक पौत्र की अपने दादा की स्मृति को सँजोए रखने की गहरी इच्छा से जनमी एक श्रद्धांजलि है और स्मरण का आह्वान भी। पीढ़ियों से चली आ रही कहानियों के माध्यम से, यह सिंधी हिंदू समुदाय - जिसकी जड़ें सिंधु नदी के तट और सिंध की प्राचीन विरासत तक फैली हैं-के इतिहास, संस्कृति और अदम्य इच्छाशक्ति का विश्लेषण करती है।
इस पुस्तक का मुख्य विषय विस्थापन की पीड़ा, विभाजन के आघात और उन अनगिनत सिंधी हिंदुओं के मौन दुःख का चिंतन है, जिन्हें अपनी पैतृक भूमि छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह इस बात की पड़ताल करती है कि कैसे भाषा, परंपराओं और सामूहिक स्मृति का क्षरण विश्व की सबसे पुरानी तथा जीवंत हिंदू सभ्यताओं में से एक के अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है। साथ ही यह उस लचीलेपन, उद्यमशीलता और सांस्कृतिक समृद्धि को भी रेखांकित करती है, जिसने सिंधियों को दुनिया भर में फलने-फूलने में सक्षम बनाया है।
यह पुस्तक पाकिस्तान में बसे सिंधी हिंदुओं के समक्ष निरंतर आने वाली चुनौतियों पर भी प्रकाश डालती है; विशेष रूप से कमजोर अल्पसंख्यक समुदायों के उत्पीड़न पर वैश्विक और उनकी दुर्दशा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का आह्वान करती है।
यह केवल एक ऐतिहासिक विवरण नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी से अपनी जड़ों से पुनः जुड़ने और अपनी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने की अपील है। यह एक आह्वान है कि सिंध का जीवंत इतिहास और संस्कृति आने वाली पीढ़ियों के लिए यों ही फलती-फूलती रहे।"