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"यह रचना ऋषिका सरस्वती वैदिक युग के उन जीवन-मूल्यों को रेखांकित करती है, जिनमें मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था, सच्चे ज्ञान की उजास, सात्त्विक प्रेम की सहज अनुभूति और विद्या के अनुशासन में पले हुए दिव्य परिवेश की सुंदर झलक है।
ऋषिका सरस्वती दिव्य तीर्थ जैसे गुरुकुल की प्राणशिरा है। समस्त विद्याओं से युक्त, अपूर्व लावण्यमयी, अनुशासन भरी जीवन शैली से युक्त वैदिक संस्कृति का संदर्शन कराती है।
यह कथाकृति भारत के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य का सौष्ठवपूर्ण मूल्यांकन करती है। आज के प्रबुद्ध भारतीय नारी समाज का दर्पण है ऋषिका सरस्वती का जीवन दर्शन !"
जन्म : 14 नवंबर, 1949 को डिहरी ऑन सोन में।
शिक्षा : स्नातक हिंदी ‘प्रतिष्ठा’ परीक्षा में विशिष्टता सहित प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान एवं स्वर्ण पदक प्राप्त, पी-एच.डी.।
रचना-संसार : ‘अरुंधती’, ‘अग्निपर्व’, ‘समाधान’, ‘बाँधो न नाव इस ठाँव’, ‘कनिष्ठा उँगली का पाप’, ‘कितने जनम वैदेही’, ‘कब आओगे महामना’, ‘कथा लोकनाथ की’ (उपन्यास); तीन उपन्यासकाएँ; ‘दंश’, ‘शेषगाथा’, ‘कासों कहों मैं दरदिया’, ‘मानुस तन’, ‘श्रेष्ठ आंचलिक कहानियाँ’, ‘कायांतरण’, ‘मृत्युगंध, जीवनगंध’, ‘भूमिकमल’ तथा ‘तर्पण’ (कहानी-संग्रह)।
सम्मान-पुरस्कार : ‘क्रौंचवध तथा अन्य कहानियाँ’ को भारतीय ज्ञानपीठ युवा कथा सम्मान, ‘लोकभूषण सम्मान’, ‘थाईलैंड पत्रकार दीर्घा सम्मान’, ‘राधाकृष्ण सम्मान’, ‘नई धारा रचना सम्मान’, ‘प्रसार भारती हिंदी सेवा सम्मान’, ‘हिंदुस्तानी प्रचार सभा सम्मान’, ‘हिंदी सेवा सम्मान’ एवं अन्य सम्मान। कला संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की सदस्य। केंद्रीय राजभाषा समिति की सदस्य, साहित्य अकादमी की सदस्य।