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"यह पुस्तक मात्र दार्शनिक सिद्धांतों का संग्रह नहीं अपितु चेतना की प्रयोगशाला में किया गया एक गहन प्रयोग है। यह उस सनातन जिज्ञासा का परिणाम है, जो प्रत्येक मनुष्य को उसके होने के मूलभूत अर्थ की ओर प्रवृत्त करती है। हमने इस यात्रा में अव्यक्त ब्रह्म के अखंड स्वरूप से लेकर मनुष्य के जीवन, वृद्धावस्था और अंतिम मुक्ति के अनुभवों तक प्राचीन भारतीय दर्शन (विशेषतः पंचकोश और अद्वैत वेदांत) तथा आधुनिक भौतिकी एवं तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) के मध्य एक अभूतपूर्व सेतु स्थापित करने का प्रयास किया है।
गहन चिंतन और आत्म-अनुभूति के आधार पर यह पुस्तक विशेष रूप से मनुष्य के उस गूढ़ अनुभव को वैज्ञानिक और दार्शनिक आयाम देती है, जहाँ आयु के साथ न्यूरोहार्मोन रिसेप्टर्स का क्षीण होना मुक्ति के आध्यात्मिक भाव को सहजता प्रदान करता है। यह क्षरण केवल अवनति नहीं है अपितु चेतना का भौतिक बंधन से मुक्ति की ओर नियोजित प्रस्थान है।
यह आपको स्वयं के भीतर झाँकने, अपने कर्मों के उद्देश्य को समझने और जीवन को 'सबकुछ' मानकर-न कि 'माया' मानकर-पूर्ण चेतना के साथ जीने के लिए प्रेरित करता है।"