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"अर्थशास्त्र प्रथम राजा के 'निर्वाचन' का उल्लेख करता है, जबकि महाभारत राजसत्ता की स्थापना के लिए 'चयन' के सिद्धांत का प्रतिपादन करता है। भारत में वंशानुगत अधिकार को कभी भी पूर्ण और अपरिवर्तनीय अधिकार नहीं माना गया-योग्यता सर्वोपरि थी। यहाँ तक कि इन मामलों में भी जनस्वीकृति अथवा लोकतांत्रिक अनुमोदन आवश्यक था। इस प्रकार भारतीय राजतंत्र वस्तुतः 'राजकीय लोकतंत्र', 'निर्वाचित राजतंत्र' अथवा 'सीमित राजतंत्र' था। पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन में, जहाँ राज्य अथवा शासक की सर्वोच्चता का विचार मिलता है, वहीं भारतीय परंपरा में धर्म ही सर्वोच्च है। 'गणदास' अर्थात् प्रजा का सेवक होने के कारण राजा को कर प्राप्त करने के लिए प्रजा से 'भिक्षा' माँगनी पड़ती है।
भारत में ऐसे अनेक राजा और सम्राट् हुए हैं, जो अपने उच्च आदर्शों, नैतिक मूल्यों और सिद्धांतनिष्ठ जीवन के लिए विख्यात रहे हैं। शासक को षड्विकारों से दूर रहकर अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। भारत में आदर्श, धर्मनिष्ठ और सदाचारी मंत्रियों की भी गौरवपूर्ण परंपरा रही है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्वतंत्रता, बंधुत्व और समानता की अवधारणाएँ फ्रांसीसी क्रांति अथवा पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन से नहीं, बल्कि भगवान् बुद्ध के प्राचीन दर्शन से ग्रहण की थीं।"