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प्रस्तुत संकलन की कविताएँ दो खंडों में विभाजित हैं। प्रथम खंड की कविताएँ एक साहित्यिक यात्रा की तरह हैं, जो प्राचीन काशी नगरी से आरंभ होकर भारत - भूमि की सनातन संस्कृति, उच्च आदर्शों और इतिहास के कुछ गौरवपूर्ण दृष्टांतों से होते हुए आधुनिक काल में भारत के विभाजन और इसके पराधीन इतिहास के दंश को दरशाती हैं और पुनरुत्थान के यज्ञ के आह्वान के साथ पूर्ण होती हैं। द्वितीय खंड की कविताओं में मानव मन के विविध प्रकार के विचारों, भावों और अनुभवों का सजीव चित्रण किया गया है, जिनसे पाठक सहजता के साथ अपना जुड़ाव महसूस कर सकेंगे।
मनीष शर्मा मूलतः पटना के निवासी हैं और इनका पैतृक आवास पश्चिम चंपारण जिले के शिकारपुर ग्राम में स्थित है। संत माइकल हाई स्कूल, पटना से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 1999 में आई.टी. (बी.एच.यू.) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। तत्पश्चात् वे इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा में चयनित हुए और विगत 26 वर्षों से भारतीय रेलवे में सेवारत हैं। राजभाषा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें राजभाषा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।
'सत्य और सनातन थे हम' मनीष शर्मा द्वारा रचित कविताओं का दूसरा प्रकाशित काव्य संग्रह है। उनकी कविताओं का पहला संकलन 'अंतर्मुखी' वर्ष 2023 में प्रकाशित हुआ था, जिसे पाठकों से भरपूर सराहना मिली थी।