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"भारतीय परंपरा में सिखी से पहले शहादत जैसा कोई संकल्प नहीं रहा। सिख धर्म में शहीदी से अर्थ केवल प्रताड़ित किए जाने या शारीरिक तौर पर असहनीय कष्ट दिया जाना प्रमुख नहीं, उसके पीछे कोई ठोस कारण होना चाहिए, जो निजी तो कदापि नहीं हो सकता। वह कारण कौम का सम्मान, मानवता की रक्षा और लोकहित के लिए अन्याय/जबर का डटकर सामना करने में से एक रहा। यह एक ऐसी परंपरा है, जिसे स्व-प्रसंगों द्वारा स्थापित किया गया है। यह मजबूरीवश नहीं होती और न ही शहादत किसी निर्भय शक्ति का प्रदर्शन है। शहीद मौत के परिणाम से अवगत होता है। उसकी शहीदी उच्च आदर्शों व मूल्यों को बनाए रखने और लोगों को जाग्रत् करने के लिए होती है।
इस पुस्तक में ऐसे ही सिख शहीदों की प्रेरक गाथाएँ प्रस्तुत हैं, जो यह बताती हैं कि इन विभूतियों ने आततायियों के दमन, अत्याचार, क्रूरता और यातनाओं को झेला पर सिख धर्म और उसकी मान्यताओं को नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने को बलिदान कर दिया पर आक्रांताओं के दबाव के आगे झुके नहीं।
देश-धर्म पर बलिदान हुए वीरों की शौर्यगाथा है यह पुस्तक।
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