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"गो कि राजन यहाँ भी हार नहीं मानता, यह देशभक्ति, मातृभक्ति आज के आणविक युग में भावुकता कहलाती है। छोटे मुँह बड़ी बात न लगे तो कहूँ कि तुम भी अब समय के साथ चलना सीखो। जिंदगी का फलसफा अब बदल गया है। प्रणव को वापस लौटने पर मजबूर मत करो। दूध की कीमत उससे मत वसूलो। वह वहाँ तरक्की करेगा। दूर रहकर उसकी बहारें देखो। अपने स्वार्थों के कारण, हमारे यहाँ माँ-बाप बच्चों के भविष्य के बारे में नहीं सोचते फिर तुम अभी बूढ़े भी नहीं हुए।
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मेरी हृदयगति बंद हो जाए, इससे पहले ही पीछे कोई गाड़ी आकर रुकी है। अरे ! यह तो वही लाल गाड़ी है। राजन उचककर, दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया है। कहना चाहती हूँ, हड़बड़ी मत करो, थोड़ा रुककर देखो पहले, कौन है। पर नहीं कहती। अब कहने-न-कहने से क्या फर्क पड़ता है। मैं भी गाड़ी के शीशे उतारने लगी हूँ। खिड़की से सिर बाहर निकाल पीछे की ओर झाँकने लगी हूँ। अब जो होना हो, हो जाए एक बार में ही।
लो देखो ! राजन तो इस भूरे बालों वाली लड़की से हाथ मिला रहा है! आवाजें सुनाई पड़ रही हैं।
- इसी पुस्तक से
प्रसिद्ध कथाकार चन्द्रकान्ता जी के विदेश प्रवास में हुए अनुभवों पर केंद्रित कहानियाँ, जो वहाँ के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने की बानगी देती हैं। ये मर्मस्पर्शी हैं, भावुक करती हैं और अनेक विसंगतियों व विरोधाभासों का बोध कराती हैं।"
जन्म : 3 सितंबर, 1938 को श्रीनगर, कश्मीर में।
शिक्षा : एम.ए. (पिलानी, राजस्थान यूनिवर्सिटी), बी.ए., बी.एड. (जम्मू-कश्मीर यूनिवर्सिटी); हिंदी प्रभाकर (ओरिएंटल कॉलेज, श्रीनगर, कश्मीर), (एम.ए.,बी.एड. में प्रथम स्थान)।
प्रकाशन : चौदह कहानी-संग्रह, सात कथा संकलन, सात उपन्यास (कथा सतीसर, अपने-अपने कोणार्क आदि), ‘यहीं कहीं आसपास’ (कविता-संग्रह), ‘हाशिये की इबारतें’ (आत्मकथात्मक संस्मरण), ‘मेरे भोजपत्र’ (संस्मरण एवं आलेख), ‘प्रश्नों के दायरे में’ (साक्षात्कार) आदि।
सम्मान-पुरस्कार : प्रतिष्ठित ‘व्यास सम्मान’ के अलावा हिंदी अकादमी, दिल्ली; हरियाणा साहित्य अकादमी, भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा अनेक पुस्तकें पुरस्कृत। रामचंद्र शुक्ल संस्थान वाराणसी, वाग्देवी पुरस्कार आदि एक दर्जन से अधिक अन्य पुरस्कार-सम्मान। 50 से अधिक शोधकार्य संपन्न; दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से अनेक धारावाहिक एवं कहानियों का प्रसारण। पचास छात्र-छात्राओं ने समग्र साहित्य पर शोध किया/ कर रहे हैं।