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"इसी पुस्तक से
ईश्वर की सृष्टि निरर्थक नहीं हो सकती। कोई मानव दावे से यह नहीं कह सकता कि प्रभु ने मानव का सृजन किया किसलिए है, परंतु एक बात निश्चित है कि मानवीय जीवन आत्मोन्नति का एक महान् अवसर है। मानव के तीन पक्ष हैं—शरीर, मन तथा आत्मा । मानव के इन्हीं तीनों पक्षों का विकास करना मानव जीवन का उद्देश्य है—
शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है, कि वह अपनी जीविका अर्जित करे तथा स्वास्थ्य के नियमों का पालन करे। (शारीरिक आरोग्यता पर आगे विस्तार से चर्चा है)
मन के विकास हेतु पठन-पाठन तथा विद्या प्राप्त करना ज़रूरी है, क्योंकि प्राकृति भेदों को समझने के लिए, बुद्धि का विकसित होना आवश्यक है। (मानसिक आरोग्यता पर आगे विस्तार से चर्चा है)
आत्मा की उन्नति के लिए ज़रूरी है कि मनुष्य स्थायी तौर पर किसी नियम-बद्ध संयम में रहकर, सदाचार को धारण करे व प्रभु सिमरन में लीन रहे। (आध्यात्मिक आरोग्यता पर आगे विस्तार से चर्चा है)"