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"""इतना आकर्षक तो भयप्रद दानव सा क्यों
दानव है तो देवों सा क्यों
क्यों वह ब्रह्मा (सृष्टि रचयिता) का शंखध्मा (शंख बजाना)
ढीला-ढाला कोट-पेंट पहने गंधर्व सुनहरा
योरोपीय यक्ष या हिंदुस्तानी जिन्न !
नया अनुभव है
उसके सावधान हाथों अब जाने मेरा क्या संभव है।""
मुक्तिबोध की अटपटी कविता में निहित जटिलता का अर्थ आसानी से समझ में आता है, जब आप 'वोट की चोट' की गहराई में डूबते हैं।
चुनावी हलचल के दौरान बयानबाजी से लथपथ भरपूर समाचार बरसते हैं। हमारे लोकतंत्र की अभिनय शैली नागरिक को पात्र बना देती है। उस पात्र का नाम है- मतदाता। मतदाता का बाना ओढ़ने पर व्यक्ति नागरिक के रूप में अपनी चिंताओं की अनदेखी न करे, यह हर चुनाव की सबसे बड़ी चुनौती है। सपनों और आश्वासनों की झूठी कहानियों के दौर में पारदर्शिता उजागर करने से चुनावी राजनीति की साख बढ़ेगी। रोचक शैली में प्रस्तुत किए गए संदर्भों का हर छोर आपके सरोकारों की याद दिलाता है।"