Sangam (Prem Ki Bhent)

Sangam (Prem Ki Bhent)   

Author: Vrindavan Lal Verma
ISBN: 817315192X
Language: Hindi
Edition: 1st
Pages: 260
Binding Style: Hard Cover
Rs. 300
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Description

भात परोसनेवाले ने नंदराम की पत्तल में परोसने के बाद कुछ चावल मुँह पर छिटक दिए । नंदराम ने मुंह पर चिपके चावलों को जल्दी से छुड़ाने की कोशिश की तो कुछ रगड़ खाकर और चिपक गए । कन्यापक्ष के लोग खिलखिलाकर हँस पड़े ।
पहली पंगत में जिस मनुष्य ने भात परोसा था, वही इस पंगत में रायता परोस रहा था ।.. बाराती बेतरह पकवानों पर टूट पड़े । थोड़ी देर में रायता परोसनेवाला ' लो साहब रायता, लो साहब रायता ' चिल्लाता हुआ सबके सामने से जाने लगा ।
नंदराम के सामने भी रायता परोसनेवाला अपनी पुकार के साथ पहुँचा । नंदराम इस समय लड्डुओं के साथ युद्ध कर रहा था, इसलिए उसने रायते के लिए सिर हिला दिया और फिर लड्डू-युद्ध में मग्न हो गया । परोसनेवाला दूसरी पत्तल के सामने पहुँचा । परंतु तिरछी निगाह से वह देख नंदराम की तरफ रहा था । नंदराम का सिर पत्तल की ओर नीचा हुआ, उधर तपाक से परोसनेवाले ने रायते का घड़ा नंदराम के सिर पर उड़ेल दिया । साफा, ओंखें, मुँह, मूँछ, कुरता और धोती तक रायते से भर गई । मुँह में पड़ा हुआ लड्डू खड़ा हो गया ।
जितनी हँसी बारातियों को पहली कच्ची पंगत के दिन आई थी, उसकी तौल से दुगुनी हँसी आज अकेले उस रायता परोसनेवाले को आई । शायद रायते की खटाई और तेजी के कारण नंदराम की आँखें बिलकुल लाल हो गईं । खाना छोड़कर मुँह पोंछता हुआ तुरंत उठ खड़ा हुआ ।
' आगे यह साला किसीके साथ ऐसा मजाक न करने पाएगा, ' कहकर नंदराम ने रायता परोसनेवाला धड़ाम से नीचे दे मारा और फिर...
- इसी उपन्यास से
ऐतिहासिक उपन्यासों के साथ -साथ वर्माजी ने जिन सामाजिक उपन्यासों की रचना का है उनमें तत्कालीन रीति-रिवाज भी साकार हो उठे हैं । ' संगम ' उपन्यास यद्यपि सामाजिक घटनाओं को लेकर लिखा गया है; तथापि यह सत्य घटनाओं पर आधारित है ।

The Author
Vrindavan Lal Verma

मूर्द्धन्य उपन्यासकार श्री वृंदावनलाल वर्मा का जन्म 9 जनवरी, 1889 को मऊरानीपुर ( झाँसी) में एक कुलीन श्रीवास्तव कायस्थ परिवार में हुआ था । इतिहास के प्रति वर्माजी की रुचि बाल्यकाल से ही थी । अत: उन्होंने कानून की उच्च शिक्षा के साथ-साथ इतिहास, राजनीति, दर्शन, मनोविज्ञान, संगीत, मूर्तिकला तथा वास्तुकला का गहन अध्ययन किया ।
ऐतिहासिक उपन्यासों के कारण वर्माजी को सर्वाधिक ख्याति प्राप्‍त हुई । उन्होंने अपने उपन्यासों में इस तथ्य को झुठला दिया कि ' ऐतिहासिक उपन्यास में या तो इतिहास मर जाता है या उपन्यास ', बल्कि उन्होंने इतिहास और उपन्यास दोनों को एक नई दृष्‍ट‌ि प्रदान की ।
आपकी साहित्य सेवा के लिए भारत सरकार ने आपको ' पद‍्म भूषण ' की उपाधि से विभूषित किया, आगरा विश्‍वविद्यालय ने डी.लिट. की मानद् उपाधि प्रदान की । उन्हें ' सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार ' से भी सम्मानित किया गया तथा ' झाँसी की रानी ' पर भारत सरकार ने दो हजार रुपए का पुरस्कार प्रदान किया । इनके अतिरिक्‍त उनकी विभिन्न कृतियों के लिए विभिन्न संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानित व पुरस्कृत किया ।
वर्माजी के अधिकांश उपन्यासों का प्रमुख प्रांतीय भाषाओं के साथ- साथ अंग्रेजी, रूसी तथा चैक भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है । आपके उपन्यास ' झाँसी की रानी ' तथा ' मृगनयनी ' का फिल्मांकन भी हो चुका है ।

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