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Mridula Sinha Ki Lokpriya Kahaniyan   

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Author Mridula Sinha
Features
  • ISBN : 9789351862772
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1st
  • ...more

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  • Mridula Sinha
  • 9789351862772
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1st
  • 2015
  • 184
  • Hard Cover

Description

मिलनेवाला प्रत्येक व्यक्ति व परिवार, जीवंत होनेवाली सारी परिस्थितियाँ और सामने से गुजरने वाले सभी प्राकृतिक दृश्य साहित्यकार की लेखनी से निःसृत होने के लिए अकुलाते रहते हैं। लेखक के मानस स्थित कथानकों और लेखनी में प्रतियोगिताएँ चलती ही रहती हैं। ‘पहले मैं’ तो ‘पहले मैं’ की स्थिति में सभी कथानक। मानस कितने कथानकों को सहेजता है, लेखनी कितनों को कागज पर उतारती है। लगभग चालीस दशकों से देश-विदेश के सघन दौरों के दौरान सहस्रों से मिलना हुआ। देश के चप्पे-चप्पे और व्यक्तियों में साहित्य के विषय बनने की ऊर्जा है। सुदूर सूखी नदी किनारे बसा एक गाँव, नदी के साथ बिसूर रहा है तो छलछल बहती नदियों और उफनते समुद्र के किनारे बसे सहस्र गाँव अपनी जीवंतता की कहानी कह गए। कहीं फसलों से लहलहाते खेत, मेंड़ पर खड़ा हुलसता-निहारता किसान, तो कहीं आकाश की ओर वर्षा की बूँदों के लिए आँखें टिकाए अपने दरारोंदार खेत की मेंड़ पर फटी धोती में खड़ा किसान। जल, थल, नभ पर पाँव रखने के लिए भागती बेटियाँ। उसकी उपलब्धियों से गद्गद पिता। परिवार की टूटन से बिखरे दाने चुनते दंपती। अपनी विकलांगता को नकारता पुरुषार्थ। लक्ष्मी को अपने घर में झुलाते, कहीं आकाश तक पहुँचते तो कहीं धरती पकड़े रह जाते लोग। सब ओर विषमताएँ, सब ओर समताएँ भी।
प्रख्यात लेखिका श्रीमती मृदुला सिन्हा की कहानियों का यही मूल स्वर है। इस संकलन में उनकी लोकप्रियता के प्रतिमान गढ़ती कहानियाँ संकलित हैं।

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अनुक्रम

कथा की अंतर्कथा — Pgs. 5

1. उधार का सूरज — Pgs. 13

2. और उसी क्षण — Pgs. 27

3. एक दीये की दीवाली — Pgs. 38

4. अचार का घड़ा — Pgs. 44

5. घर का वैरागी — Pgs. 51

6. जब-जब होहिं धरम कै हानि — Pgs. 62

7. मुसाफिर काकी — Pgs. 73

8. स्पर्श की तासीर — Pgs. 80

9. शीशा फुआ — Pgs. 86

10. दत्तक पिता — Pgs. 94

11. अनावरण — Pgs. 105

12. औलाद के निकाह पर — Pgs. 114

13. बेनाम रिश्ता — Pgs. 125

14. कटे हाथ में हथियार — Pgs. 133

15. सहस्रपूतों वाली — Pgs. 146

16. रद्दी की वापसी — Pgs. 155

17. टिफिन बॉक्स — Pgs. 165

18. विलमता बिलगाव — Pgs. 172

The Author

Mridula Sinha

हिंदी साहित्य की जानी-पहचानी लेखिका, जो साहित्य के साथ सामाजिक और राजनैतिक जीवन में भी सक्रिय रहकर एक आंदोलनात्मक व रचनात्मक दृष्‍टि लिये तीनों क्षेत्रों के बीच समन्वय स्थापित करती रही हैं। पिछले तीन दशकों में विभिन्न विधाओं में चालीस पुस्तकों के प्रकाशन के साथ समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए विशेष सूत्र भी दिए हैं, जिनमें प्रमुख हैं— बिटिया है विशेष, तीन पीढि़याँ रहें संगसाथ, वृद्धाश्रम और पालनाघर संयुक्‍त हो, स्वैच्छिक क्षेत्र में लोकतंत्र के ‘पाँचवाँ स्तंभ’ की स्थापना। ‘कन्या जन्मोत्सव’ और ‘विवाह पूर्व परामर्श।’ कन्या भ्रूण हत्या और विवाह विघटन रोकने में इनका कारगर और अनुकरणीय प्रयास रहा है। स्‍‍त्री विकास के लिए ‘पुरानी नींव, नया निर्माण’ का लक्ष्य समाज के सामने रखा है। परिवार संस्कार के विषयों पर निरंतर लेखन। ‘स्‍‍त्री विमर्श का भारतीय दृष्‍टिकोण’ पर अत्यधिक रचनाएँ। विभिन्न रचनाओं पर फिल्में और धारावाहिक भी बने हैं।अब तक छह उपन्यास, आठ कहानी संग्रह, दो लोककथा संग्रह, एक दर्जन ललित निबंध संग्रह, एक संपादकीय संग्रह प्रकाशित। ‘राजपथ से लोकपथ पर’ (राजमाता सिंधिया की आत्मकथा) का संपादन और ‘पुण्यात्मा’ स्मृति ग्रंथ का लेखन भी। आंग्ल भाषा में भी इनके स्तंभ आ रहे हैं। कई भाषाओं में रचनाएँ अनूदित हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन। ‘पाँचवाँ स्तंभ’ मासिक पत्रिका (हिंदी) का संपादन।

संप्रति : गोवा  की राज्यपाल ।

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