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भारत माँ के अमर सपूत लोकमान्य बालगंगाधर तिलक एक संघर्षशील राजनेता थे। उन्होंने मृतप्राय भारतीय समाज को संघर्ष करने की प्रेरणा दी। इस संघर्ष से एक नए समाज का उदय हुआ, एक नए युग का आरंभ हुआ। स्वराज्य उनके लिए धर्म था, स्वराज्य उनके लिए जीवन था। स्वदेशी आंदोलन के लिए उन्होंने गणपति महोत्सव शुरू किया, भारतीयों को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए तैयार किया।
कोरे आदर्शवाद से लोकमान्य का संपर्क नहीं था। उन्होंने व्यावहारिक विषयों पर व्यावहारिक दृष्टिकोण से चिंतन किया। उनका चिंतन उनके कार्यों का आधार बना। लोकमान्य तिलक तत्कालीन शिक्षा-प्रणाली से पूर्णत: असंतुष्ट थे। तिलक चाहते थे कि हमारी शिक्षा-प्रणाली स्वतंत्र देश के समान हो। उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दिए जाने पर जोर दिया।
तिलक अपने तेज से एक पूरे युग को नई आभा से मंडित कर गए। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता-आंदोलन को केवल प्रेरणा ही नहीं दी, वरन् संघर्ष करने की एक निश्चित योजना भी दी।
ऐसे अमर साधक, कर्मयोगी, राष्ट्ररक्षक और सत्य के प्रतिपालक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की विचारधारा से अपने देश की युवा पीढ़ी को परिचित कराने और प्रेरित करने का मंगलकारी संकल्प लेकर तैयार किया गया प्रस्तुत संकलन युवा पीढ़ी को समर्पित है।
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| विषय-क्रम | बुद्ध —Pgs. 76 |
| स्वराज्य के उद्घोषक —Pgs. 7 | बुद्ध और ईसा —Pgs. 76 |
| लोकमान्य बालगंगाधर तिलक —Pgs. 11 | बुद्धि —Pgs. 77 |
| मैं तिलक बोल रहा हूँ —Pgs. 29 | बुद्धि और मन —Pgs. 80 |
| अंग्रेज —Pgs. 29 | बौद्ध तथा ईसाई धर्म —Pgs. 80 |
| अंग्रेजी शिक्षा —Pgs. 29 | बौद्धधर्म —Pgs. 80 |
| अंग्रेजी सरकार —Pgs. 29 | ब्रह्मचर्य —Pgs. 80 |
| अंग्रेजों से —Pgs. 30 | भक्ति —Pgs. 81 |
| अंतःकरण —Pgs. 30 | भक्तिमार्ग —Pgs. 81 |
| अधिकार —Pgs. 30 | भय —Pgs. 82 |
| अधिकारी —Pgs. 31 | भाग्य —Pgs. 82 |
| अपने विषय में —Pgs. 31 | भारत —Pgs. 82 |
| अभय-वचन —Pgs. 32 | भारत में स्वशासन —Pgs. 83 |
| अमृत बाजार पत्रिका —Pgs. 32 | भारतीय —Pgs. 83 |
| असंतोष —Pgs. 33 | भारतीय कृषि —Pgs. 85 |
| अस्पृश्यता —Pgs. 33 | भारतीय धर्म-सिद्धांत —Pgs. 86 |
| अहंकार —Pgs. 34 | भारतीय नेता —Pgs. 86 |
| अहिंसा का पालन —Pgs. 34 | भारतीय साहित्य —Pgs. 86 |
| आचरण —Pgs. 34 | भावना की भाषा —Pgs. 87 |
| आतंकवाद —Pgs. 35 | भाषा —Pgs. 87 |
| आत्मनिर्भर —Pgs. 35 | भूलें —Pgs. 87 |
| आत्मा —Pgs. 35 | मजदूर किसान —Pgs. 87 |
| आलसी —Pgs. 36 | मद्यनिषेध —Pgs. 88 |
| आलस्य —Pgs. 36 | मन —Pgs. 89 |
| आलोचना —Pgs. 36 | मनुष्य —Pgs. 89 |
| इंद्रिय-निग्रह —Pgs. 37 | मनोदेवता —Pgs. 89 |
| इंद्रियाँ —Pgs. 37 | माँग —Pgs. 89 |
| ईश्वर पर विश्वास —Pgs. 37 | मातृभाषा —Pgs. 90 |
| उत्तरदायी सरकार —Pgs. 38 | मानव-प्रकृति —Pgs. 91 |
| उत्सव —Pgs. 38 | मूर्ख —Pgs. 91 |
| उदारवाद-उग्रवाद —Pgs. 39 | मैक्समूलर —Pgs. 91 |
| उदारवादी-उग्रवादी —Pgs. 39 | मोक्ष —Pgs. 91 |
| उदारवादी सरकार —Pgs. 39 | मोक्ष और कामना —Pgs. 91 |
| उद्बोधन —Pgs. 40 | युवक —Pgs. 92 |
| उपदेश —Pgs. 40 | राजा —Pgs. 92 |
| उपनिषद् —Pgs. 40 | राज्य-सत्ता —Pgs. 92 |
| एकता —Pgs. 40 | राष्ट्र —Pgs. 93 |
| औद्योगिक शिक्षा —Pgs. 41 | राष्ट्रभाषा —Pgs. 93 |
| कठिनाइयाँ —Pgs. 41 | राष्ट्रीय विद्यालय —Pgs. 94 |
| कर —Pgs. 41 | लक्ष्य —Pgs. 94 |
| कर्जन —Pgs. 41 | लघु उद्योग —Pgs. 95 |
| कर्तव्य-अकर्तव्य —Pgs. 42 | लाला लाजपतराय —Pgs. 95 |
| कर्तव्य-पथ —Pgs. 42 | लिपि —Pgs. 95 |
| कर्ता —Pgs. 42 | लोक-संग्रह —Pgs. 96 |
| कर्म —Pgs. 42 | बजट —Pgs. 96 |
| कर्मचारी —Pgs. 44 | वर्ण —Pgs. 96 |
| कर्मफल —Pgs. 45 | वर्ण-व्यवस्था —Pgs. 97 |
| कर्मयोग —Pgs. 45 | विकेंद्रीकरण —Pgs. 97 |
| कष्ट —Pgs. 46 | विचार —Pgs. 97 |
| कष्टभोग —Pgs. 46 | विदेशी —Pgs. 97 |
| कष्ट सहन —Pgs. 46 | विदेशीपन —Pgs. 98 |
| कांग्रेस —Pgs. 47 | विदेशी भाषा —Pgs. 98 |
| कानून —Pgs. 47 | विपत्तियाँ —Pgs. 98 |
| काल की मर्यादा —Pgs. 48 | विद्यार्थी और राजनीति —Pgs. 99 |
| किसान —Pgs. 48 | विद्रोह करें —Pgs. 99 |
| कृषि-नीति —Pgs. 48 | विरोध —Pgs. 99 |
| क्रोध —Pgs. 48 | विवेकानंद —Pgs. 100 |
| क्षत्रिय —Pgs. 49 | विश्वास —Pgs. 100 |
| गति —Pgs. 49 | विषय —Pgs. 100 |
| गीता —Pgs. 49 | वीर —Pgs. 100 |
| गीता और महाभारत —Pgs. 51 | वीरपूजा —Pgs. 101 |
| गीता का तात्पर्य —Pgs. 52 | वेदांग और योग —Pgs. 101 |
| गीता धर्म —Pgs. 52 | वैदिक धर्म —Pgs. 101 |
| गीताध्ययन —Pgs. 52 | व्यवस्था —Pgs. 102 |
| गीता-रहस्य —Pgs. 53 | व्यवस्थापक —Pgs. 102 |
| गुप्तचर —Pgs. 53 | शक्ति —Pgs. 102 |
| गोपालकृष्ण गोखले —Pgs. 53 | शक्तिशाली —Pgs. 103 |
| ग्रंथ-परीक्षा —Pgs. 54 | शब्द —Pgs. 103 |
| ग्रामीण प्रशासन —Pgs. 55 | शरीर —Pgs. 103 |
| चिकित्सा —Pgs. 55 | शासक —Pgs. 104 |
| जनता —Pgs. 55 | शासक/जनता —Pgs. 104 |
| जनता के सेवक —Pgs. 56 | शासक-शासित —Pgs. 104 |
| जनता से —Pgs. 56 | शासन-प्रणाली —Pgs. 105 |
| जनमत —Pgs. 57 | शासन-शासक —Pgs. 105 |
| जनहित —Pgs. 57 | शास्त्रीय पद्धति —Pgs. 105 |
| जमशेदजी टाटा —Pgs. 58 | शिक्षा —Pgs. 106 |
| जागरूकता —Pgs. 58 | शिक्षा का माध्यम —Pgs. 107 |
| जाति —Pgs. 59 | शिक्षा-प्रणाली —Pgs. 108 |
| जिज्ञासा —Pgs. 59 | शिक्षित वर्ग —Pgs. 108 |
| ज्ञान —Pgs. 59 | शिक्षितों से —Pgs. 108 |
| डोमिनियन स्टेट्स —Pgs. 60 | शिवाजी —Pgs. 108 |
| थियोसॉफिस्ट —Pgs. 60 | शिवाजी-उत्सव —Pgs. 109 |
| थियोसॉफी —Pgs. 60 | शिशिरकुमार घोष —Pgs. 111 |
| दंड —Pgs. 60 | शिष्टाचार —Pgs. 112 |
| दादाभाई नौरोजी —Pgs. 61 | श्रद्धा —Pgs. 112 |
| दान —Pgs. 61 | श्रद्धा-भक्ति —Pgs. 113 |
| दुःख —Pgs. 61 | संकल्प —Pgs. 113 |
| दुःख-सुख —Pgs. 61 | संकल्प-शक्ति —Pgs. 113 |
| देवनागरी —Pgs. 61 | संगठन —Pgs. 114 |
| देवियाँ —Pgs. 62 | संन्यास-मार्ग —Pgs. 114 |
| देशभक्त —Pgs. 62 | संस्था —Pgs. 114 |
| धनी —Pgs. 62 | सज्जन —Pgs. 115 |
| धर्म —Pgs. 63 | सज्जनता —Pgs. 115 |
| धर्म और सत्य —Pgs. 64 | सत्य —Pgs. 115 |
| धार्मिक शिक्षा —Pgs. 64 | सत्याग्रही —Pgs. 116 |
| नरम-गरम दल —Pgs. 65 | सदसद्विवेचन —Pgs. 116 |
| नाम —Pgs. 65 | समबुद्धि —Pgs. 116 |
| नायक —Pgs. 65 | समय —Pgs. 118 |
| नित्यधर्म —Pgs. 65 | समर्थन —Pgs. 118 |
| निर्बल —Pgs. 66 | सरकार —Pgs. 118 |
| निष्ठा —Pgs. 66 | सरकार की आलोचना —Pgs. 119 |
| नीति —Pgs. 66 | सरकारी कार्य-प्रणाली —Pgs. 119 |
| नीतिशास्त्र —Pgs. 66 | सांप्रदायिकता —Pgs. 119 |
| नेता —Pgs. 66 | साहस —Pgs. 120 |
| नौकरशाही —Pgs. 67 | सुख —Pgs. 120 |
| न्यायाधीश —Pgs. 67 | सुख-दुःख —Pgs. 121 |
| पत्नी का वियोग —Pgs. 68 | सुनागरिक —Pgs. 121 |
| पत्रकार —Pgs. 68 | सेवा —Pgs. 122 |
| पत्रकारिता —Pgs. 68 | स्थितप्रज्ञ —Pgs. 122 |
| परतंत्रता —Pgs. 68 | स्मारक —Pgs. 122 |
| पराधीन भारत —Pgs. 70 | स्वतंत्रता —Pgs. 123 |
| परिस्थिति —Pgs. 70 | स्वतंत्रता की इच्छा —Pgs. 123 |
| परोपकार —Pgs. 70 | स्वदेशी —Pgs. 123 |
| पाप —Pgs. 71 | स्वदेशी-आंदोलन —Pgs. 124 |
| पूर्वजों की स्मृति —Pgs. 71 | स्वदेशीवाद —Pgs. 124 |
| प्रकृति —Pgs. 71 | स्वदेशी शासक —Pgs. 124 |
| प्रतिनिधि —Pgs. 72 | स्वराज्य —Pgs. 125 |
| प्रतीक —Pgs. 72 | स्वराज्य-कामना —Pgs. 130 |
| प्रयास —Pgs. 73 | स्वराज्य की माँग —Pgs. 130 |
| प्रश्न —Pgs. 73 | स्वराज्य-प्राप्ति —Pgs. 130 |
| प्राचीन शासन-व्यवस्था —Pgs. 74 | स्वशासन —Pgs. 131 |
| प्रेस की स्वतंत्रता —Pgs. 74 | स्वहित —Pgs. 133 |
| फलभोग —Pgs. 74 | हमारा कर्तव्य —Pgs. 133 |
| फिरोजशाह मेहता —Pgs. 74 | हरबर्ट स्पेंसर —Pgs. 134 |
| बंगाल का विभाजन —Pgs. 75 | हिंदू-धर्म —Pgs. 134 |
| बहिष्कार —Pgs. 75 | हिंसा —Pgs. 135 |
| बात —Pgs. 76 | होमरूल —Pgs. 136 |
| बाधा न पहुँचाएँ —Pgs. 76 | विविध —Pgs. 139 |
जन्म : सन् 1944, संभल ( उप्र.) ।
डॉ. अग्रवाल की पहली पुस्तक सन् 1964 में प्रकाशित हुई । तब से अनवरत साहित्य- साधना में रत आपके द्वारा लिखित एवं संपादित एक सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आपने साहित्य की लगभग प्रत्येक विधा में लेखन-कार्य किया है । हिंदी गजल में आपकी सूक्ष्म और धारदार सोच को गंभीरता के साथ स्वीकार किया गया है । कहानी, एकांकी, व्यंग्य, ललित निबंध, कोश और बाल साहित्य के लेखन में संलग्न डॉ. अग्रवाल वर्तमान में वर्धमान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बिजनौर में हिंदी विभाग में रीडर एवं अध्यक्ष हैं । हिंदी शोध तथा संदर्भ साहित्य की दृष्टि से प्रकाशित उनके विशिष्ट ग्रंथों-' शोध संदर्भ ' ' सूर साहित्य संदर्भ ', ' हिंदी साहित्यकार संदर्भ कोश '-को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है ।
पुरस्कार-सम्मान : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा व्यंग्य कृति ' बाबू झोलानाथ ' (1998) तथा ' राजनीति में गिरगिटवाद ' (2002) पुरस्कृत, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली द्वारा ' मानवाधिकार : दशा और दिशा ' ( 1999) पर प्रथम पुरस्कार, ' आओ अतीत में चलें ' पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ का ' सूर पुरस्कार ' एवं डॉ. रतनलाल शर्मा स्मृति ट्रस्ट द्वारा प्रथम पुरस्कार । अखिल भारतीय टेपा सम्मेलन, उज्जैन द्वारा सहस्राब्दी सम्मान ( 2000); अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानोपाधियाँ प्रदत्त ।