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झारखंड एक अजूबा राज्य है। बहुत प्यारा-सा असीम संभावनाओं वाला। प्रकृति ने दिल खोलकर इस पर सारा कुछ लुटा दिया है। पर्यटन, खनिज, वन और हॉर्टिकल्चर संपदा आधारित उद्योग, कृषि, खेल, शिक्षा आदि जिस किसी क्षेत्र पर शासन-प्रशासन और सिविल सोसाइटी कार्य करना चाहे, बहुत ऊँचाई तक ले जा सकता है, लेकिन...। इस लेकिन की भरपाई बाद में भी की जा सकती थी, लेकिन अपने लोग भी राज्य की संपदा में लूटपाट मचाने लगे, इसलिए पूरा-का-पूरा सूबा बदनामियों का सबब बन गया है। सामान्य लेखों से इस गाथा को बयान करना संभव नहीं है, फिर भी कोशिश है कि इसकी हकीकत समझी जाए और आने वाली नस्लें उनसे सबक ले सकें। इसके स्याह पक्ष में छिपा यह उजाला है। उम्मीद ही दुनिया का दूसरा नाम है। उम्मीद है कि पाठक इस छोटे से प्रयास को समझेंगे; गुण-ग्राहक की नाईं।