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"सुभाष चंद्र बोस भावनात्मकता के प्रतिमान हैं। वे वैयक्तिक महत्त्वाकांक्षा के साथ आई.सी.एस. की परीक्षा देते हैं और राष्ट्रीय भावना के साथ उससे त्यागपत्र दे देते हैं। गांधी के विरुद्ध जाकर कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाते हैं, पुनः त्यागपत्र देकर 'आजाद हिंद फौज' की पहली उद्घोषणा में ही गांधी को 'राष्ट्रपिता' कहकर संबोधित करते हैं।
उनके सारे भाषण भावनाप्रवण हैं और सारी रणनीति भावुकतापूर्ण। जब वे टोपी लगाकर सैन्य वेशभूषा में होते हैं, तब भगत सिंह के मार्ग पर चलते दिखते हैं और जब टोपी उतारकर बंगाली धोती-कुरते में होते हैं तो गांधीवादी की तरह दिखने लगते हैं। उनमें गांधी की आस्तिकता भी है, भगत की नास्तिकता भी। वे एक रहस्यवादी हैं और अपने हृदय की सुनते हैं।
गांधी की हत्या की गई, अपने ही देशवासी द्वारा। गोडसे ने उन्हें गोली मारी, सबके सामने; वह भी प्रार्थना के वक्त। सच कहें तो नैतिक व्यक्ति बाहर बहुत सम्मान पाता है, मगर घरवालों की नजर में या तो वह नकारा हो जाता है या फिर नकारात्मक ।
- इसी पुस्तक से"