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"मेरे पास नाटक की कला है। क्यों न इसके मंचन के माध्यम से मैं भारत के एक-एक व्यक्ति को पकड़-पकड़कर डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी के बारे में बताऊँ कि कैसे बंगाल से आया एक व्यक्ति अपने दिल में बंगाल विभाजन का दर्द लिये, अपनी ऊँची आवाज में संसद् में पंडित नेहरू के सामने जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को उठाता रहा, शेख अब्दुल्ला को चेतावनी देता रहा, जब उन्हें लगा कि अब बात सिर से ऊपर निकल गई तो उन्होंने जम्मू-कश्मीर परमिट सिस्टम के विरुद्ध जम्मू-कश्मीर जाने की घोषणा की और कहा कि 'या तो विधान लूँगा या बलिदान दूँगा।' उन्होंने भारत जैसे विशाल देश की एकता के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। श्रीनगर में दिया उनका यह बलिदान देशभक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है, जो आज की पीढ़ी को पता होना चाहिए।
हमारे इतिहास में डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी एक नायक हैं, यह बात सबको पता होनी चाहिए। आज यह नाटक आप लोगों के हाथों में है। यह नाटक एक असाधारण व्यक्ति के चरित्र को प्रस्तुत करते हुए हमें प्रेरणा देता है और संदेश भी।"