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"अमित शाह अगर देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले गृहमंत्री नहीं बनते तो भी इस पुस्तक को लिखना तो बनता ही था। अपने तीन दशक लंबे पत्रकारिता कॅरियर में इस प्रकार के राजनीतिक व्यक्तित्व को कार्य करते देखना अपने आप में ही अद्भुत अनुभव है।
संसद् में जब भी कोई सत्र होता है तो प्रतीक्षा रहती है कि अमित शाह का संबोधन कब होगा। गृहमंत्री के रूप में उन्होंने ऐसे जटिल मुद्दों को उठाया है, जिनके बारे में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि हमारे जीते जी कभी ऐसा संभव हो सकेगा, जैसे-अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे पुलिस कानून। हमने स्वीकार कर लिया था कि ऐसे ही चलता रहेगा।
ब्रिटिश राज के काले कानूनों को बदला जाना कुछ उसी प्रकार का परिवर्तन है, जैसे प्रधानामंत्री का पुरानी संसद् से नई संसद् में शिफ्ट होने का निर्णय। यह केवल कालजयी बदलाव नहीं बल्कि मानसिकता में परिवर्तन का संकेत भी था। अब हम अपना भारत बनाना चाहते हैं-और वह भी हर स्तर पर।"