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"बचपन से जवानी (जिंदगी की पहली उड़ान) में जिंदगी के कटु सत्य को भी फुलवारी में हो रहे क्रिकेट मैच के समानांतर रखकर उम्र और गुजरे जमाने का सामयिक तथा तुलनात्मक व्याख्यान है। घर-परिवार की कहानी उम्र और वक्त के साथ कैसे बदल जाती है और खून के रिश्तों में भी दूरियाँ आ जाती हैं। घर का मालिक रह चुका व्यक्ति अचानक हर जरूरत की चीजें माँगने पर मजबूर हो जाता है। बच्चों के खेलने के दिन गुजर जाते हैं; एक दिन वही बच्चे बड़े हो जाते हैं- समय के साथ सब बदल जाता है।
यह उपन्यास एक किशोर के ऊपर केंद्रित है, जिसका नाम बंसी है। बंसी के जीवन में प्राकृतिक एवं सामाजिक रोमांच के साथ-साथ दुःखों की गठरियों का भी समायोजन है। उसकी दुःख की गठरियों में मुख्य रूप से साइकिल की चेन उतरने का दर्द प्रधान है। बाकी बाढ़ पीड़ितों के दर्द को आत्मसात् कर वह पराए दुःख को भी अपना निजी दुःख बना लेता है, जिसमें उसका मित्र मनोहर भी शामिल होता है।
दुःख-सुख और दुनिया की बेचैनियों से परे बंसी के हृदय में एक निश्चल प्रेमधारा उत्पन्न होती है। एक ऐसी युवती के लिए, जो ताँगे पर आना-जाना करती है। यह एक अधूरी कहानी है, जो अगली बार पूरी हो जाए शायद ! या फिर कभी भी नहीं।"