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"एक पता है, लेकिन यहाँ कोई आना नहीं चाहता। लोहे का एक दरवाजा है, लेकिन कोई इसे पार करना नहीं चाहता। मुझे एक पुल बनाना है। यह उसी जिद की यात्रा है। इस उपन्यास में आप जिन पात्रों को मिलेंगे, वे जेल-यात्राओं के दौरान मेरे संपर्क में आए अनगिनत पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की मिली-जुली छवियाँ हैं।
1993 से दिल्ली की तिहाड़ जेल, 2015 में गाजियाबाद (डासना), 2016 में आगरा, 2017 में मध्य प्रदेश, 2018 में लखनऊ, 2019 में बांदा और नैनी जेल, 2020 से हरियाणा की जेलें, विदेशों में मॉरीशस और नॉर्वे की जेलें। जब भी किसी जेल के दौरे से लौटी तो वहाँ की कुछ धूप-छाँव मेरे साथ चली आई। यह उपन्यास अनुभवों के उन्हीं टुकड़ों की कुछ बूंदें हैं, जो इन कागजों ने सोखी हैं।"