Atishaya

Atishaya   

Author: Mridula Sinha
ISBN: 9789386001375
Language: Hindi
Publisher: Prabhat Prakashan
Edition: 1
Publication Year: 2016
Pages: 287
Binding Style: Hard Cover
Rs. 400
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Description

‘‘जीवन जीने के क्रम में जब हम पाँचों इंद्रियों की लगाम ढीली कर देते हैं तो हमारी भी स्थिति महाभारत के नहुष-पुत्र ययाति जैसी होती है। ययाति के जीवन में आए अनुभवों से हमारी सभी पीढि़यों को लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने अपने पुत्र पुरु को उसका यौवन लौटाते हुए भोग की वीथियों से निकलकर जो संदेश दिए, वे हमारी संस्कृति और समाज-जीवन के संबल रहे हैं। हमें आनेवाली पीढ़ी को भी सौंपना चाहिए।

सुख, सुख और सुख! सुख और सुविधा की चाह में मनुष्य दुःखी होता जा रहा है। उपभोक्तावाद को हमने जीवन-व्यवहार बना लिया। भूख, भय, भ्रष्टाचार और प्रदूषण से दुनिया तबाह हो रही है। आतंकवाद के पीछे भी भय है; दूसरों से भय, छीने जाने का भय, ठगे जाने का भय। इसलिए हिंसा बढ़ रही है। कितना भी भौतिक संपत्ति-संपन्न राष्ट्र क्यों न हो, आतंकवाद के आगे तबाह हो जाता है, टूट जाता है। यह विश्वबंधुत्व भाव की अनुपस्थिति की स्थिति है। बड़ी-बड़ी भौतिक उपलब्धियाँ क्षणों में समाप्त की जा सकती हैं। इसलिए कि मनुष्य को मनुष्य बनाने पर बल नहीं दिया जा रहा।

आज भारतीय जीवन-शैली में रचा-बसा संदेश दुनिया को सुनाने की आवश्यकता है और वह संदेश है संयम का, त्याग का; भोग का नहीं।
—इसी पुस्तक से
विश्व भर में भारत के उत्कर्ष का जयघोष करती पीढ़ी का संदेश प्रसारित करता एक पठनीय उपन्यास।

The Author
Mridula SinhaMridula Sinha

हिंदी साहित्य की जानी-पहचानी लेखिका, जो साहित्य के साथ सामाजिक और राजनैतिक जीवन में भी सक्रिय रहकर एक आंदोलनात्मक व रचनात्मक दृष्‍टि लिये तीनों क्षेत्रों के बीच समन्वय स्थापित करती रही हैं। पिछले तीन दशकों में विभिन्न विधाओं में चालीस पुस्तकों के प्रकाशन के साथ समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए विशेष सूत्र भी दिए हैं, जिनमें प्रमुख हैं— बिटिया है विशेष, तीन पीढि़याँ रहें संगसाथ, वृद्धाश्रम और पालनाघर संयुक्‍त हो, स्वैच्छिक क्षेत्र में लोकतंत्र के ‘पाँचवाँ स्तंभ’ की स्थापना। ‘कन्या जन्मोत्सव’ और ‘विवाह पूर्व परामर्श।’ कन्या भ्रूण हत्या और विवाह विघटन रोकने में इनका कारगर और अनुकरणीय प्रयास रहा है। स्‍‍त्री विकास के लिए ‘पुरानी नींव, नया निर्माण’ का लक्ष्य समाज के सामने रखा है। परिवार संस्कार के विषयों पर निरंतर लेखन। ‘स्‍‍त्री विमर्श का भारतीय दृष्‍टिकोण’ पर अत्यधिक रचनाएँ। विभिन्न रचनाओं पर फिल्में और धारावाहिक भी बने हैं।अब तक छह उपन्यास, आठ कहानी संग्रह, दो लोककथा संग्रह, एक दर्जन ललित निबंध संग्रह, एक संपादकीय संग्रह प्रकाशित। ‘राजपथ से लोकपथ पर’ (राजमाता सिंधिया की आत्मकथा) का संपादन और ‘पुण्यात्मा’ स्मृति ग्रंथ का लेखन भी। आंग्ल भाषा में भी इनके स्तंभ आ रहे हैं। कई भाषाओं में रचनाएँ अनूदित हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन। ‘पाँचवाँ स्तंभ’ मासिक पत्रिका (हिंदी) का संपादन।

संप्रति : गोवा  की राज्यपाल ।

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