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Author Mridula Sinha
Features
  • ISBN : 9789386231383
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1
  • ...more

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  • Mridula Sinha
  • 9789386231383
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1
  • 2016
  • 159
  • Hard Cover

Description

वैसे तो एक दार्शनिक प्रश्न के अनेक जवाब हो सकते थे। विज्ञान एवं दर्शन में यही तो अंतर है। दर्शनशास्त्र में कहीं दो-दो चार 
ही होते हैं तो कहीं पाँच भी हो सकते हैं या 
मात्र तीन।

जब टाँगें कटी हों तो अन्य अंगों की सुडौलता की क्या जरूरत। आने-जानेवालों की निगाहें तो अभावग्रस्त स्थान से ही जा टकराएँगी।

स्त्रियों को आदर्श का नशा चढ़ जाए तो वे पुरुषों से कई कदम आगे बढ़ जाती हैं।

एक के लिए जीने से बेहतर है अनेक के लिए जीना।

जो जहाँ जिस रूप में है, आकाश उसे वैसा ही दिखता है; उतना ही दिखता है। उसके लिए उतना ही भर आकाश उसका होता है।

ईश्वर ने रोने की शक्ति देकर वरदान ही तो दिया है मनुष्य को। आँखों को धोकर साफ-सुथरा करनेवाला अश्रु। स्रोत अंदर न होता तो मनुष्य की आँखों में कितना कचरा इकट्ठा हो गया होता, उसकी दृष्टि ही चली गई होती।

नारी चाहे कितनी ही कम उम्र की हो, पुरुषों को समझने में दक्ष होती है। इसीलिए तो सेवा-काम स्त्रियों के जिम्मे दिया जाता है।
—इसी पुस्तक से

दिव्यांग-जीवन का दिग्दर्शन कराता मर्मस्पर्शी, मानवीय संवेदना से भरपूर भावनात्मक उपन्यास।

The Author

Mridula Sinha

हिंदी साहित्य की जानी-पहचानी लेखिका, जो साहित्य के साथ सामाजिक और राजनैतिक जीवन में भी सक्रिय रहकर एक आंदोलनात्मक व रचनात्मक दृष्‍टि लिये तीनों क्षेत्रों के बीच समन्वय स्थापित करती रही हैं। पिछले तीन दशकों में विभिन्न विधाओं में चालीस पुस्तकों के प्रकाशन के साथ समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए विशेष सूत्र भी दिए हैं, जिनमें प्रमुख हैं— बिटिया है विशेष, तीन पीढि़याँ रहें संगसाथ, वृद्धाश्रम और पालनाघर संयुक्‍त हो, स्वैच्छिक क्षेत्र में लोकतंत्र के ‘पाँचवाँ स्तंभ’ की स्थापना। ‘कन्या जन्मोत्सव’ और ‘विवाह पूर्व परामर्श।’ कन्या भ्रूण हत्या और विवाह विघटन रोकने में इनका कारगर और अनुकरणीय प्रयास रहा है। स्‍‍त्री विकास के लिए ‘पुरानी नींव, नया निर्माण’ का लक्ष्य समाज के सामने रखा है। परिवार संस्कार के विषयों पर निरंतर लेखन। ‘स्‍‍त्री विमर्श का भारतीय दृष्‍टिकोण’ पर अत्यधिक रचनाएँ। विभिन्न रचनाओं पर फिल्में और धारावाहिक भी बने हैं।अब तक छह उपन्यास, आठ कहानी संग्रह, दो लोककथा संग्रह, एक दर्जन ललित निबंध संग्रह, एक संपादकीय संग्रह प्रकाशित। ‘राजपथ से लोकपथ पर’ (राजमाता सिंधिया की आत्मकथा) का संपादन और ‘पुण्यात्मा’ स्मृति ग्रंथ का लेखन भी। आंग्ल भाषा में भी इनके स्तंभ आ रहे हैं। कई भाषाओं में रचनाएँ अनूदित हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन। ‘पाँचवाँ स्तंभ’ मासिक पत्रिका (हिंदी) का संपादन।

संप्रति : गोवा  की राज्यपाल ।

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