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"विशिष्टाद्वैत वेदान्त के ग्रंथों पर यद्यपि अनेकानेक ग्रंथ लिखे गए हैं, किंतु आचार्य रामानुज के आविर्भाव के पूर्व इसके क्रमबद्ध समीक्षात्मक अध्ययन पर अभी तक कोई भी ग्रंथ प्रकाश में नहीं आया है। प्रस्तुत पुस्तक की रचना इसी रिक्तता की पूर्ति हेतु किया गया एक लघु प्रयास है, जिसमें यह दरशाने का प्रयास किया है कि वेदों में बीज रूप में पाए जाने वाले विशिष्टाद्वैत वेदांत के सिद्धांत आचार्य रामानुज के पूर्व तक एक सुव्यवस्थित आधार प्राप्त कर चुके थे। इसी शक्त आधार पर रामानुज ने अपने विशिष्टाद्वैत मत के विशाल एवं दुर्भेद्य भवन को निर्मित किया।
गुरु कृपा तथा अपने परिश्रम के बल पर विषय को समझने तथा उसे क्रमबद्ध रूप से निरूपित करने का प्रयास मैंने किया है। मेरा यह प्रयास कितना सार्थक एवं सफल है? यह तो मैं नहीं कह सकता, किंतु इसका नीर-क्षीर विवेक स्वयं वही सुधीजन करेंगे, जिनके समक्ष यह पुस्तक सादर प्रस्तुत है।"