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"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष को समर्पित इस पुस्तक के विषयों में हिंदू समाज को संगठित करने के उद्देश्य में आने वाली चुनौतियों के साथ समाज को भ्रमित करने वाले झूठ को अनावृत्त करने का प्रयास किया गया है। इसमें राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत् करने, अनुशासन एवं चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त बनाने तथा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के उद्देश्यों को तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर सत्यापित करने का प्रयास भी किया गया है।
सौ वर्ष के अपने दीर्घ और सतत सामाजिक जीवन में संघ ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक संघर्षों तक अपनी भूमिका निभाई है; साथ ही समाज के उन क्षेत्रों में भी अप्रतिम कार्य किया है, जो प्रायः मुख्यधारा के विमर्श से बाहर रहे। इसके बावजूद संघ को एकांगी दृष्टि से देखने और प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति निरंतर बनी रही है। पुस्तक के अध्याय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विविध आयामों को तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं। यह पुस्तक पाठकों को पूर्वग्रह से मुक्त होकर तथ्यों के आधार पर संघ के योगदान-अवदान को स्वयं निष्कर्ष निकालने का अवसर देती है।"