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अगले दिन हम सुबह ही वर्माजी के घर जा पहुँचे। वहाँ बड़ी भीड़ थी। प्रायः सबके हाथ में कुछ कागज भी थे। किसी को गली की समस्या थी, तो किसी को बिजली के खंभे की। किसी को अपने या अपने किसी रिश्तेदार के लिए नौकरी चाहिए थी, तो किसी को दुकान। वर्माजी सबसे बड़ी चतुराई से निबट रहे थे।
कभी वे गरम हो जाते, तो कभी नरम। कभी किसी के साथ वे अंदर जाकर गुपचुप बात करते, तो किसी को सबके सामने हड़काने लगते। शर्माजी से उन्होंने चाय का आग्रह किया; पर मुझे पानी तक को नहीं पूछा। उनको बार-बार रंग बदलता देख मैं समझ गया कि जरूर इनके डी.एन.ए. में गिरगिट के कुछ अंश हैं।
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जरा सोचिए, अभी तो ‘मेरा भारत महान्’ विकासशील देश है; पर जब यह पूर्ण विकसित हो जाएगा, तब सड़क पर झाड़ू लगाते सफाईकर्मी, खेत में आधी धोती पहनकर हल चलाते किसान, फटी लँगोटीवाले भिखारी सब टाईवाले ही होंगे। घरों में झाड़ू-पोंछा करनेवाली महिलाएँ और गलियों में आवाज लगाकर फल-सब्जी बेचनेवाले इसे लगाकर आएँगे।
टाईवाले चालक के रिक्शा में बैठकर लगेगा मानो पूरा ब्रिटेन आपकी गुलामी कर रहा है। दूधवाला अपने साथ-साथ भैंस के गले में भी इसे लटका देगा। इससे दूध में पर्याप्त पानी होने पर भी दो-चार रुपए फालतू देते हुए आपको कष्ट नहीं होगा। —इसी संग्रह से
वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करनेवाली चुटीली व्यंग्य रचनाओं का संकलन।
विजय कुमार—जन्म : 1956 में।
शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र ।
छात्र-जीवन से ही लेखन, संपादन एवं सामाजिक कार्यों में रुचि। आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में रहे।
2000-2008 : सहायक संपादक 'राष्ट्रधर्म' (मासिक) लखनऊ।
2008-2016 : विश्व हिंदू परिषद्, केंद्रीय कार्यालय, दिल्ली में प्रकाशन विभाग से संबद्ध रहे।
2016-2024 : निदेशक, विश्व संवाद केंद्र, देहरादून।
प्रकाशन : छोटी-बड़ी 16 पुस्तकें प्रकाशित। 600 से अधिक लेख, व्यंग्य, निबंध आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं तथा अंतरजाल (इंटरनेट) पर प्रकाशित। नियमित लेखन का क्रम जारी।
साप्ताहिक 'पाञ्चजन्य' में 1992 से निरंतर तीस वर्ष छह पंक्तियों के काव्य- स्तंभ 'प्रशांत वाणी' का प्रकाशन। 2009 से 2016 तक पाक्षिक स्तंभ 'व्यंग्य बाण' भी प्रकाशित हुआ।
पर्यटन मंत्रालय की 'सिंधु दर्शन स्मारिका' में लेह-लद्दाख यात्रा-वृत्तांत प्रकाशित ।
अनेक स्मारिकाओं तथा विशेषांकों के संकलन व संपादन में सहयोग।
संप्रति : माधव सेवा विश्राम सदन, ऋषिकेश।