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"व्यंग्य तब और मारक हो जाता है जब वह हँसते-हँसाते किसी व्यक्ति को रुला दे, उसके भीतर करुणा का संचार कर दे। इतना ही नहीं, जब वह व्यंग्य पूरा हो तो व्यक्ति उसके प्रभाव से अपने भीतर कहीं-न-कहीं थोड़ा सा बदल जाए। ऐसा कोई भी नहीं है, जो रोजमर्रा के जीवन की कठिन परिस्थितियों से दिन-प्रति-दिन रूबरू न होता हो। ऐसे में आम इनसान के पास विकल्प क्या बचता है ? या तो वह रोते हुए परिस्थिति को दोष देते हुए जीवन गुजार दे या फिर इन्हीं परिस्थितियों में खुश रहने के तरीके तलाश ले।
'डेढ़ इंच मुसकान वाले लोग' वर्तमान समय में ऐसे ही रास्ते को तलाशता हुआ व्यंग्य-संग्रह है। इस पुस्तक के सभी व्यंग्य हृदयस्पर्शी हैं, जिन्हें पढ़ना प्रारंभकरते ही बिना पूरा पढ़े कोई भी पाठक रुक नहीं सकता।"