Musahibjoo (Ramgarh Ki Rani)

Musahibjoo (Ramgarh Ki Rani)   

Author: Vrindavan Lal Verma
ISBN: 8173151334
Language: Hindi
Publisher: Prabhat Prakashan
Edition: 1st
Publication Year: 2011
Pages: 188
Binding Style: Hard Cover
Rs. 250
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Description

मुसाहिबजू ने पूछा-' राजा ने कोई नवीन आज्ञा निकाली है?'
कोतवाल ने कहा-' हाँ । '
मुसाहिब ने बिना किसी संयम के तुरंत पूछा-' वह क्या? क्या आज्ञा निकली है?'
' उसी को प्रकट करने अकेला आया हूँ । ' कोतवाल ने मुसाहिबजू की आँख में आख गड़ाकर उत्तर दिया-' मर्जी हुई है कि मेहतरों को और लल्ली को पकड़कर किले के बंदीगृह में बंद कर दो और आपको पकड़कर दरबार में पेश करो ।
' मुसाहिबजू ने भी निगाह मिलाए हुए ही कहा-' और यदि ऐसा न हो सके तो?'
कोतवाल बोला-‘ इसके आगे उन्होंने और कुछ मर्जी तो नहीं की है, परंतु इसके आगे जो कुछ होना चाहिए वह मैं समइा गया हूँ । '
मुसाहिबजू-' वह क्या?'
कोतवाल-' वह यह कि अपने ऊपर हथियार चलाकर मैं आत्मघात कर लूँ ।
' मुसाहिबजू ने दृढ़तापूर्वक कहा-' जो कुछ भी हो । राजा की आज्ञा का पालन मेरे जीते-जी नहीं हो सकता ।'
-इसी उपन्यास से
समर्पण, सेवा और अनुशासन का भाव सैनिक का गुण है । सच्चा सैनिक अपने देश और शासक के लिए अपना सिर दे भी सकता है और किसी का सिर ले भी सकता है । पर यदि शासक के कारण सैनिक के सिर पर ही आ बने तो? इतिहास गवाह है, ऐसे समय में शासकों ने अपने सिर कटा दिए अपने सेवक के मान की खातिर । ऐतिहासिक घटना पर आधारित वर्माजी का यह प्रसिद्ध उपन्यास ऐसे ही सैनिक और शासक की कहानी है ।

The Author
Vrindavan Lal VermaVrindavan Lal Verma

मूर्द्धन्य उपन्यासकार श्री वृंदावनलाल वर्मा का जन्म 9 जनवरी, 1889 को मऊरानीपुर ( झाँसी) में एक कुलीन श्रीवास्तव कायस्थ परिवार में हुआ था । इतिहास के प्रति वर्माजी की रुचि बाल्यकाल से ही थी । अत: उन्होंने कानून की उच्च शिक्षा के साथ-साथ इतिहास, राजनीति, दर्शन, मनोविज्ञान, संगीत, मूर्तिकला तथा वास्तुकला का गहन अध्ययन किया ।
ऐतिहासिक उपन्यासों के कारण वर्माजी को सर्वाधिक ख्याति प्राप्‍त हुई । उन्होंने अपने उपन्यासों में इस तथ्य को झुठला दिया कि ' ऐतिहासिक उपन्यास में या तो इतिहास मर जाता है या उपन्यास ', बल्कि उन्होंने इतिहास और उपन्यास दोनों को एक नई दृष्‍ट‌ि प्रदान की ।
आपकी साहित्य सेवा के लिए भारत सरकार ने आपको ' पद‍्म भूषण ' की उपाधि से विभूषित किया, आगरा विश्‍वविद्यालय ने डी.लिट. की मानद् उपाधि प्रदान की । उन्हें ' सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार ' से भी सम्मानित किया गया तथा ' झाँसी की रानी ' पर भारत सरकार ने दो हजार रुपए का पुरस्कार प्रदान किया । इनके अतिरिक्‍त उनकी विभिन्न कृतियों के लिए विभिन्न संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानित व पुरस्कृत किया ।
वर्माजी के अधिकांश उपन्यासों का प्रमुख प्रांतीय भाषाओं के साथ- साथ अंग्रेजी, रूसी तथा चैक भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है । आपके उपन्यास ' झाँसी की रानी ' तथा ' मृगनयनी ' का फिल्मांकन भी हो चुका है ।

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