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"बेटी हूँ मैं
मुझे पता है कि हमारी कोई बेटी नहीं
पर मुझे बेटियों की कीमत पता है
मेरी माँ ने दी है
मुझे तालीम कि मैं खुश रहूँ और आगे बढूँ
और हर बेटी को अपनी ही बेटी मानूँ
उन्हें अपने कंधे से ऊँचा उठाऊँ
कि कल जब मैं सिर उठा के देखूँ
तो उसका कद मुझे ऊँचा दिखे
और वह मुझे देखे अपनी सीढ़ी-सी
जिस पर कदम रख वह आगे बढ़ी।
- इसी पुस्तक से
कविता एक कवि के मन से स्वतः ही प्रस्फुटित होती है, कभी चिड़िया को फुदकते देख तो कभी उगते सूरज को देख। कवयित्री के लिए कविता लिखना इन सबसे इतर नहीं है, जहाँ जो देखा, महसूस किया, कोशिश की कि उसे तुरंत ही अपने शब्दों में पिरो लें।
कविता एक नदी है, जो अचानक ही परिस्थितियों से निकलती है और प्रवाह बनकर शब्दों के आलोड़न में गतिमान होती जाती है, कभी लयबद्ध तो कभी स्वच्छंद। कविता उनके लिए जीवन है, जो स्वयं आकार लेती है और उन्हें जरिया बना कहीं इतिहास में स्वयं को स्थापित किए जा रही है।"