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"घुमक्कड़ों की कहानी
क्या भारत को केवल देखा जा सकता है या उसे समझने के लिए उसके साथ चलना भी पड़ता है ?
'चरैवेति' इसी प्रश्न का उत्तर खोजता एक विराट् घुमक्कड़ उपन्यास है। एक रहस्यमयी डायरी से आरंभ हुई यह कथा कुछ अनजान यात्रियों को कन्याकुमारी से हिमालय तक ऐसी यात्रा पर ले जाती है, जहाँ हर पड़ाव केवल एक स्थान नहीं, बल्कि आत्मबोध का एक नया द्वार बन जाता है। अयोध्या की सरयू, ब्रज की रज, प्रयाग का संगम, बोधगया का बोधिवृक्ष, काशी की अनश्वर चेतना, उज्जैन का महाकाल, द्वारका का सागर, रामेश्वरम् की आस्था, नागपुर की राष्ट्रचेतना, अमृतसर की सेवा, राजस्थान का मरुस्थल, कश्मीर की वादियाँ और भारत के असंख्य तीर्थ, नगर, वन, पर्वत तथा जनपद इस उपन्यास में केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि जीवंत पात्रों की तरह पाठक के साथ चलते हैं।
सरल, प्रवाहपूर्ण और संवेदनशील भाषा में रचा गया यह उपन्यास भारतीय घुमक्कड़ी की महान् परंपरा, सांस्कृतिक एकात्मता और कर्मयोग के शाश्वत संदेश को आधुनिक पीढ़ी से जोड़ता है। यह केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं, बल्कि भारत को देखने, स्वयं को पहचानने और चल पड़ने का निमंत्रण है।
क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी मंजिल कहीं पहुँचना नहीं, बल्कि निरंतर सीखते, जुड़ते और आगे बढ़ते रहना है।
चरैवेति चलते रहो।"