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काफी सिर खपाने के बाद पिछले दिनों मुझे इस बारे में अंतिम सत्य पता लग ही गया। वह यह है कि अमीरी की रेखा मकान, गाड़ी, घड़ी, कपड़े या कलम से नहीं, शौचालय से तय होती है।
हमारे देश के महान् ‘योजना आयोग’ के कार्यालय में दो शौचालयों की मरम्मत में 35 लाख रुपए खर्च कर दिए गए। जरा सोचिए, मरम्मत में इतने खर्च हुए, तो नए बनने में कितने होते होंगे? जब कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति की, तो योजना आयोग के मुखिया श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इसे बिल्कुल ठीक बताया।
मैं उनकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ। बहुत से विचारकों का अनुभव है कि यही एकमात्र ऐसी जगह है, जहाँ व्यक्ति बिल्कुल एकांत में कुछ देर बैठकर, शांत भाव से मौलिक चिंतन कर सकता है। कई लेखकों को कालजयी उपन्यासों के विचार यहीं बैठकर आए हैं। श्री अहलूवालिया और उनके परम मित्र मनमोहन सिंह की जिन योजनाओं से रुपया रसातल में जा रहा है, उसके बारे में चिंतन और मनन इतने आलीशान शौचालय में ही हो सकता है।
—इसी संग्रह से
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समाज की विषमताओं और विद्रूपताओं पर मारक प्रहार करके अंतरावलोकन करने का भाव जाग्रत् करनेवाले व्यंग्य। ये न केवल आपको हँसाएँगे-गुदगुदाएँगे, बल्कि आपके अंतर्मन को उद्वेलित कर मानवीय संवेदना को उभारेंगे।
विजय कुमार—जन्म : 1956 में।
शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र ।
छात्र-जीवन से ही लेखन, संपादन एवं सामाजिक कार्यों में रुचि। आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में रहे।
2000-2008 : सहायक संपादक 'राष्ट्रधर्म' (मासिक) लखनऊ।
2008-2016 : विश्व हिंदू परिषद्, केंद्रीय कार्यालय, दिल्ली में प्रकाशन विभाग से संबद्ध रहे।
2016-2024 : निदेशक, विश्व संवाद केंद्र, देहरादून।
प्रकाशन : छोटी-बड़ी 16 पुस्तकें प्रकाशित। 600 से अधिक लेख, व्यंग्य, निबंध आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं तथा अंतरजाल (इंटरनेट) पर प्रकाशित। नियमित लेखन का क्रम जारी।
साप्ताहिक 'पाञ्चजन्य' में 1992 से निरंतर तीस वर्ष छह पंक्तियों के काव्य- स्तंभ 'प्रशांत वाणी' का प्रकाशन। 2009 से 2016 तक पाक्षिक स्तंभ 'व्यंग्य बाण' भी प्रकाशित हुआ।
पर्यटन मंत्रालय की 'सिंधु दर्शन स्मारिका' में लेह-लद्दाख यात्रा-वृत्तांत प्रकाशित ।
अनेक स्मारिकाओं तथा विशेषांकों के संकलन व संपादन में सहयोग।
संप्रति : माधव सेवा विश्राम सदन, ऋषिकेश।