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"आजाद भारत में यह एक ऐसा दौर था, जब दशकों की डेमोक्रेसी, जिस पर भारतीयों को बहुत गर्व था, को एक बेशर्म तानाशाही के लिए छोड़ दिया गया था।
यह पुस्तक उस दर्दनाक समय का ब्योरा है, जब हजारों लोगों को जेल में डाल दिया गया था, शासक तानाशाह बन गए थे और अनगिनत भारतीयों ने खुद को और अपने परिवारों को बहुत जोखिम में डालकर इमरजेंसी की बेड़ियों से लड़ाई लड़ी थी। इस उम्मीद में कि भारत में फिर कभी इमरजेंसी न लगे, उन बुरे दिनों को याद करते हुए, यह पुस्तक इसकी शुरुआत, इसके असर और आखिर में इसके खत्म होने पर रोशनी डालती है।
यह ऐतिहासिक बातों, ऑफिशियल रिपोर्ट और निजी अनुभवों के आधार पर लिखी गई है।
उस समय लेखक केरल में एक स्टूडेंट लीडर थे। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के टोटल रेवोल्यूशन मूवमेंट में एक्टिव रूप से हिस्सा लिया था।
यह पुस्तक देश के उन लाखों लोगों को इमरजेंसी के बारे में बताती है, जो खुशकिस्मत थे कि उस दौर में नहीं रहे। लेकिन उन्हें सच जानने की जरूरत है-और यही डरावना सच यह पुस्तक बताती है।"