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"भारतीय संत-परंपरा में संत शिरोमणि गुरु रविदासजी महाराज ऐसे युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्होंने अपनी कर्म-साधना और गहन आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से समरस समाज का स्वप्न देखा। अपनी वाणी द्वारा उन्होंने एक ऐसे समाज की परिकल्पना प्रस्तुत की, जहाँ किसी भी प्रकार के भेदभाव के लिए कोई स्थान न हो और प्रत्येक व्यक्ति को गरिमामय जीवन जीने के पूर्ण अवसर प्राप्त हों। संपादकद्वय ने गुरुजी के विचारों को ऐतिहासिक एवं सामयिक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में समझने का सार्थक प्रयास किया है तथा यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि उनका दर्शन मध्यकाल की सीमाओं को पारकर समकालीन भारत के लिए भी पूर्णतः प्रासंगिक बना हुआ है।
इस पुस्तक के दो प्रमुख सूत्रमन चंगा तो कठौती में गंगा और बेगमपुरा गुरु रविदासजी के दर्शन के मूल आधार हैं। प्रथम सूत्र अंतःकरण की पवित्रता, श्रम की गरिमा तथा कर्म की श्रेष्ठता को अभिव्यक्त करता है, जबकि द्वितीय सूत्र एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना प्रस्तुत करता है, जहाँ दुःख, अन्याय, जातिगत विषमता और सामाजिक भेदभाव का कोई स्थान न हो। इस दृष्टि से बेगमपुरा मात्र आध्यात्मिक कल्पना नहीं, अपितु समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा पर आधारित समाज की प्रेरक अवधारणा है। निस्संदेह, यह कृति शोधार्थियों, विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा समरस समाज के निर्माण में रुचि रखने वाले सभी पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। संपादकद्वय को इस महत्त्वपूर्ण कृति के लिए हार्दिक साधुवाद !
- प्रो. के.जी. सुरेश, निदेशक, भारत पर्यावास केंद्र, नई दिल्ली। पूर्व महानिदेशक, भारतीय जनसंचार संस्थान। पूर्व कुलगुरु, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल"