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"रंजना तीर की तरह भीड़ को चीरती हुई बढ़ी। साथ-साथ मैं भी था। मैंने निकट आकर देखा-लाश तिरंगे झंडे में लपेटकर उठाई जा रही है। सामने रवि का बूढ़ा पिता पथराई आँखों से उसे देखता रहा। गोरे सैनिक भी उसे गार्ड ऑफ ऑनर दे रहे थे। इतना कहते-कहते महिपत फूट-फूटकर बच्चों की तरह रोने लगा।
रुदन के भीगे और बोझिल स्वर में बहता गया, ""रवि तिरंगे से लिपटकर चल पड़ा, मास्टर। रंजना ने उस समय भी 'वंदे मातरम्' गाया। उसका वह स्वर आज भी मेरे कानों में गूँज रहा है। कितनी ऊर्जा थी उस दिन उसकी आवाज में ! उसकी संगीत-लहरी मानो गरज रही थी के बोले माँ तुमि अबले, बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम् रिपुदलवारिणीं मातरम्।"" इतना कहते-कहते महिपत फिर नहीं बोल पाया। केवल रोता रहा, बिलख-बिलखकर रोता रहा।
- इसी उपन्यास से
'के बोले माँ तुमि अबले' उपन्यासकार मनु शर्मा द्वारा लिखी, राष्ट्र के प्रति समर्पित दो पीढ़ियों की क्रांतिकारी कथा है। स्वतंत्रता की अकुलाहट में ये क्रांतिवीर सार्वजनिक सभाओं में तो आजादी का तराना 'वंदे मातरम्' गाते हैं, लेकिन भूमिगत रूप से अंग्रेज सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के केंद्र में रहते हैं।
यह उपन्यास हमें उस क्षण के पास ले जाता है, जब स्वतंत्रता पहले देश में नहीं, कुछ बेचैन दिलों में जन्म ले रही थी। इतिहास बताता है कि भारत कब आजाद हुआ। यह उपन्यास उस आजादी के पहले की धड़कन सुनाता है। उसी धड़कन को अगली पीढ़ी 'जेन-जी' तक पहुँचाना शायद इस पुस्तक के पुनर्प्रकाशन का सबसे सुंदर मायने है।"
मनु शर्मा ने साहित्य की हर विधा में लिखा है। उनके समृद्ध रचना-संसार में आठ खंडों में प्रकाशित ‘कृष्ण की आत्मकथा’ भारतीय भाषाओं का विशालतम उपन्यास है। ललित निबंधों में वे अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं तो उनकी कविताएँ अपने समय का दस्तावेज हैं। जन्म : सन् 1928 की शरत् पूर्णिमा को अकबरपुर, फैजाबाद में। शिक्षा : काशी विश्वविद्यालय, वाराणसी।
किताबें : ‘तीन प्रश्न’, ‘राणा साँगा’, ‘छत्रपति’, ‘एकलिंग का दीवान’ ऐतिहासिक उपन्यास; ‘मरीचिका’, ‘विवशता’, ‘लक्ष्मणरेखा’, ‘गांधी लौटे’ सामाजिक उपन्यास तथा ‘द्रौपदी की आत्मकथा’, ‘द्रोण की आत्मकथा’, ‘कर्ण की आत्मकथा’, ‘कृष्ण की आत्मकथा’, ‘गांधारी की आत्मकथा’ और ‘अभिशप्त कथा’ पौराणिक उपन्यास हैं। ‘पोस्टर उखड़ गया’, ‘मुंशी नवनीतलाल’, ‘महात्मा’, ‘दीक्षा’ कहानी-संग्रह हैं। ‘खूँटी पर टँगा वसंत’ कविता-संग्रह है, ‘उस पार का सूरज’ निबंध-संग्रह है।
सम्मान और अलंकरण : गोरखपुर विश्व-विद्यालय से डी.लिट. की मानद उपाधि। उ.प्र. हिंदी संस्थान का ‘लोहिया साहित्य सम्मान’, केंद्रीय हिंदी संस्थान का ‘सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार’, उ.प्र. सरकार का सर्वोच्च सम्मान ‘यश भारती’ एवं साहित्य के लिए म.प्र. सरकार का सर्वोच्च ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’।
संपर्क : 382, बड़ी पियरी, वाराणसी।