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"जैसा कि पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट हो जा रहा है कि परमात्म-प्राप्ति के लिए प्रेम अनिवार्य है। प्रेम जैसा दुनिया में कुछ कहाँ। प्रेम बिना ये जीवन कहाँ। प्रेम देखो झुक जाओ वहाँ। प्रेम बसता है जहाँ। परमात्मा है वहाँ।
जीवन के प्रिय-अप्रिय अनुभवों का मूर्त रूप है 'प्रेम से परमात्मा', जो सहज ही कविता रूप में प्रवाहित हो गई है। बाहरी और भीतरी दोनों जगत् में सामंजस्य बैठाने का प्रयास है यह पुस्तक। हम ऐसा बनें कि अपेक्षा और उपेक्षा दोनों को सँभाल सकें और जीवन को सार्थक बना सकें। यही सोचकर आंतरिक भावों को पाठक के समक्ष रख दिया गया है- ज्यों-का-त्यों।
अपने संकल्प पर डटे रहो। कुछ नहीं किसी से कहो। अपने-आप में बने रहो। सार्थक संकल्प पर अड़े रहो।"