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"यह पुस्तक भारत की प्राचीन ऋषि-परंपरा और उनके अद्वितीय ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में पुनर्स्थापित करने का प्रयास है। इसमें यह दरशाया गया है कि कैसे ऋषियों ने न केवल मंत्रों का दर्शन किया, बल्कि उन्होंने विज्ञान, तर्कशास्त्र, तत्त्वमीमांसा और आत्मज्ञान की ऐसी गहराई में प्रवेश किया, जिसे आज का विज्ञान भी पूरी तरह नहीं समझ पाया है।
यह केवल एक ऐतिहासिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक आह्वान है कि हम भारतीय ज्ञान-परंपरा को पुनर्जीवित करें, अपने मूल को जानें और ज्ञान का पुनर्जागरण करें। यह पुस्तक उनके लिए है, जो भारतीय ज्ञान की जड़ों को वैज्ञानिक, दार्शनिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं।"