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"पाप और प्रायश्चित्त' के विपरीत - जहाँ कहानी आत्मग्लानि और लाचारी के इर्द-गिर्द घूमती थी - संजय भारती की यह नई कृति, आक्रोश, गुस्से और बगावत का दस्तावेज है, जब पीड़ित की चीखें समाज के बहरे कानों तक नहीं पहुँच पातीं और व्यवस्था से न्याय मिलने की सारी उम्मीदें दम तोड़ देती हैं, तब यह उपन्यास एक गंभीर चुनौती बनकर उभरता है।
इसके केंद्र में मौजूद केंद्रीय पात्र केवल सहने वाले नहीं हैं, बल्कि वे व्यवस्था और रूढ़िवादी मान्यताओं से सीधे सवाल करने वाले बागी किरदार हैं। लेखक ने यहाँ पाठकों को किसी भी तरह का उपदेश देने के बजाय उन्हें नैतिकता के एक ऐसे कठघरे में खड़ा कर दिया है, जहाँ खुद से यह पूछना आवश्यक हो जाता है कि न्याय न मिलने पर लिया गया बदला कितना जायज है।
यह महज कल्पनाओं का संसार नहीं है, बल्कि उस सच्चाई का आईना है, जो दिखाती है कि जब कानून और नैतिकता खामोश हो जाते हैं, तब इनसान का सब्र टूटता है और केवल और केवल प्रतिशोध की आग ही शेष रह जाती है।"
संजय भारती एक बहुआयामी लेखक, फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने अनेक सरकारी डॉक्यूमेंट्री फिल्में और सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्में बनाई हैं, जो विभिन्न सरकारी विभागों और जन-जागरूकता अभियानों से जुड़ी रही हैं।
उनकी पूर्व-प्रकाशित कृति 'पाप और प्रायश्चित्त' काफी चर्चित रही। उनकी लेखनी समाज, न्याय, मानवता और व्यवस्था से संबंधित जटिल प्रश्नों को गहराई से उठाती है।
वह फ्रेमवे प्रोडक्शंस और वीरप्रभा रीइन्वेंटिंग लाइव्स फाउंडेशन के निर्देशक भी हैं। वह सामाजिक विषयों पर फिल्मों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के रोजगार, स्वरोजगार और आजीविका सशक्तीकरण के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। उनका मानना है कि कला और सामाजिक सेवा के समन्वय से समाज में वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है।
फिल्म, साहित्य और सामाजिक सरोकार - इन तीनों क्षेत्रों में उनका कार्य उन्हें एक संवेदनशील और प्रतिबद्ध रचनाकार के रूप में पहचान दिलाता है।