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"भीड़ छँट चुकी थी। सरला किनारे हटकर श्यामू की प्रतीक्षा में खड़ी रही। उसने उसे अपनी ओर आते हुए भी देखा, पर बीच में ही रोककर मुंशिया ने श्यामू से कुछ कहा और फिर वह चला गया। सरला का माथा ठनका। उसे उस समय और भी घबराहट हुई, जब महादेव भी मुंशी से बातें करके चुपचाप घिसक गया।
सरला को अब साफ लगा कि यह किसी षड्यंत्र के तहत हो रहा है, पर अब वह क्या करे ? वह एकदम अकेली थी। कटी पतंग की तरह परिस्थितियों के आकाश में बिल्कुल अकेली। यह भी नहीं मालूम कि हवाओं के अनजान झोंके किधर ढकेल देंगे।
- इसी पुस्तक से
यह कहानी 26 जनवरी, 1956 की ठंडी, बरसती रात से शुरू होती है। जब बनारस का एक स्कूल मास्टर भीगता हुआ एक अनाथालय के बरामदे में शरण लेता है और दरवाजे की दरार से वह सब देख लेता है, जो उसे नहीं देखना चाहिए था।
लेखक ने इस पुस्तक में वह भारत उतार दिया है, जो आजादी के कुछ ही बरस बाद अपने ही सपनों से आँख चुरा रहा था-जहाँ खद्दर पहनकर एक हत्यारा नेता बन जाता है, जहाँ अनाथालय की दीवार पर 'अनाथ अबलाओं की सहायता करो' लिखा है और भीतर उन्हीं अबलाओं का सौदा हो रहा है।
और इन सबके बीच एक स्त्री है सरला, जिससे हर कोई वही तीन सवाल पूछता है, कहाँ की हो, कौन हो, क्यों आई ? वह जवाब नहीं देती। पुस्तक का शीर्षक इन्हीं तीन प्रश्नों पर है।"
मनु शर्मा ने साहित्य की हर विधा में लिखा है। उनके समृद्ध रचना-संसार में आठ खंडों में प्रकाशित ‘कृष्ण की आत्मकथा’ भारतीय भाषाओं का विशालतम उपन्यास है। ललित निबंधों में वे अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं तो उनकी कविताएँ अपने समय का दस्तावेज हैं। जन्म : सन् 1928 की शरत् पूर्णिमा को अकबरपुर, फैजाबाद में। शिक्षा : काशी विश्वविद्यालय, वाराणसी।
किताबें : ‘तीन प्रश्न’, ‘राणा साँगा’, ‘छत्रपति’, ‘एकलिंग का दीवान’ ऐतिहासिक उपन्यास; ‘मरीचिका’, ‘विवशता’, ‘लक्ष्मणरेखा’, ‘गांधी लौटे’ सामाजिक उपन्यास तथा ‘द्रौपदी की आत्मकथा’, ‘द्रोण की आत्मकथा’, ‘कर्ण की आत्मकथा’, ‘कृष्ण की आत्मकथा’, ‘गांधारी की आत्मकथा’ और ‘अभिशप्त कथा’ पौराणिक उपन्यास हैं। ‘पोस्टर उखड़ गया’, ‘मुंशी नवनीतलाल’, ‘महात्मा’, ‘दीक्षा’ कहानी-संग्रह हैं। ‘खूँटी पर टँगा वसंत’ कविता-संग्रह है, ‘उस पार का सूरज’ निबंध-संग्रह है।
सम्मान और अलंकरण : गोरखपुर विश्व-विद्यालय से डी.लिट. की मानद उपाधि। उ.प्र. हिंदी संस्थान का ‘लोहिया साहित्य सम्मान’, केंद्रीय हिंदी संस्थान का ‘सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार’, उ.प्र. सरकार का सर्वोच्च सम्मान ‘यश भारती’ एवं साहित्य के लिए म.प्र. सरकार का सर्वोच्च ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’।
संपर्क : 382, बड़ी पियरी, वाराणसी।