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"नागालैंड में ईसाई आतंकवाद सह अलगाववाद वर्ष 1946 से शुरू हुआ। यह आतंकवाद और भारत विरोधी आंदोलन अमेरिकन डीप स्टेट और अमेरिकन बैपटिस्ट चर्च द्वारा प्रायोजित था और आज भी है। इसलिए अमरीकन बैपटिस्ट ईसाई नागा आतंकवादी हिंदी, हिंदू और हिंदुस्थान का विरोध करते थे, क्योंकि हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य नागा समाज को भारतमाता से जुड़ी उनके गर्भनाल (umbilical cord) की याद दिलाती है, उनके हिंदू पूर्वजों के उज्ज्वल और गौरवशाली इतिहास को उनके समक्ष उजागर करती है, जिसको मिटाने का षड्यंत्र अमेरिकन बैपटिस्ट चर्च संगठन ने किया है।
समय ने करवट बदला और नागा समाज के जागरूक वर्ग ने ईसाई होते हुए भी अपनी पुरातन सांस्कृतिक जड़ की तलाश करना प्रारंभ किया। भारतमाता की कोख से जुड़ी अपने गर्भनाल की तलाश शुरू हुई। यहाँ हिंदी भाषा की भूमिका उन नागा अन्वेषकों को अपरिहार्य लगी और उनके प्रयास के कारण राज्य सरकार प्रभावित हुई और हिंदी का पठन-पाठन सरकारी तथा निजी सभी शिक्षा मंदिरों (विद्यालयों) में प्रारंभ हो गया।
विद्वान् लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता जगदंबा मल्ल ने नागालैंड में काली रात से सूर्योदय तक की हिंदी-यात्रा का सटीक वर्णन किया है, जो एक संग्रहणीय दस्तावेज के साथ-साथ शोधकर्ताओं के लिए भी उपयोगी है।"