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"समय की कसौटी पर खरे उतरे हमारे वैदिक आदर्शों, जैसे- 'सत्यमेव जयते', स 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः' को आज आधुनिक संवैधानिक संदर्भों में पुनर्जीवित करने की नितांत आवश्यकता है। स्वाधीनता का अर्थ अनैतिक कार्यों का लाइसेंस नहीं हो सकता। यदि हमें एक प्रबुद्ध, तकनीकी रूप से उन्नत, पर्यावरण के अनुकूल, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और नैतिक रूप से सुदृढ़ समाज का निर्माण करना है तो हमें अपने अधिकारों की सजगता के साथ-साथ अपने समकालीन कर्तव्यों को दैनिक आचरण में ढालना ही होगा।
प्रस्तुत पुस्तक 'हमारे मूल कर्तव्य' इसी वैचारिक पुनर्जागरण का एक विनम्र प्रयास है। इस पुस्तक के माध्यम से यह प्रतिपादित करने का प्रयत्न किया गया है कि मूल कर्तव्य केवल कागजी विधिक उपदेश नहीं हैं, बल्कि ये हमारी राष्ट्रीय जीवितता (National Survival) और अस्मिता की अनिवार्य शर्तें हैं। पुस्तक में आज की समकालीन परिस्थितियों, जैसे-डिजिटल नागरिकता, स्वदेशी आधारित आर्थिक उत्तरदायित्व, जातिगत भेदों का उन्मूलन, मातृशक्ति का वास्तविक व डिजिटल सम्मान, मूल्य-केंद्रित परिवार व्यवस्था और पाँच व्यावहारिक पर्यावरणीय संकल्पों (जल, प्लास्टिक, पेड़, कचरा और ऊर्जा संरक्षण) के आलोक में नागरिक कर्तव्यों का एक नव-संवैधानिक विमर्श प्रस्तुत किया गया है।"