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"भारत की नदियों का वर्णन करते हुए व्यासजी ने उन्हें 'विश्वस्य मातरः' कहा है। सचमुच नदियाँ लोकमाता ही होती हैं। लेकिन सब नदियों को हम माता नहीं कहते। विश्वामित्र ने तमसा नदी को अपनी बहन कहा है। हमारे गाँव की छोटी मार्कंडी मेरी छोटी बहन है। हम बचपन में साथ बहुत खेले हैं। यमुना नदी काल भगवान् यमराज की बहन है और गुजरात की ताप्ती या तपती नदी तो यमराज के पिता सूर्यनारायण की पुत्री कही जाती है।
ब्रह्मपुत्र का दर्शन मैंने सदिया और परशुराम कुंड (ब्रह्मपुत्र) से लेकर गोवालंदी तक और आगे जाकर पद्मा और मेघना के नाम से किया है। ब्रह्मपुत्र न बहन है, न माता। वह तो सृजन और संहार की लीला में मस्त एक देवता है। पृथ्वी के भूचाल भी ब्रह्मपुत्र की उसी लीला में मदद करते हैं। युद्ध-धर्म का उत्कर्ष बताने वाले क्षत्रियों का संहार करते-करते ब्राह्मणवीर परशुराम को कहीं भी शांति नहीं मिलती थी। उसे वह ब्रह्मपुत्र के किनारे मिली और यहाँ पर उसने अपने हत्यारे परशु का त्याग किया था।
हमारे पूर्वजों ने अपने ढंग से नदियों के स्तोत्र और नदियों के पुराण बनाए। अब हमारे जमाने के साहित्यकारों को चाहिए कि वे आधुनिक ढंग से नदियों के स्तोत्र और नदियों के पुराण हमें दे दें। श्री देवेंद्र सत्यार्थी ने अपने उपन्यास 'ब्रह्मपुत्र' द्वारा नदी-पुत्रों के लोकजीवन का पुराण प्रस्तुत किया है। हमारे संस्कृत पुराणों में ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा और देवी-देवताओं की भरमार होती है। अब लोकयुग शुरू हुआ है। अब तो हमारे पुराण लोकजीवन को ही प्राधान्य देंगे। इसका प्रारंभहम 'ब्रह्मपुत्र' में पाते हैं। - काका कालेलकर"
जन्म : 28 मई, 1908 को पंजाब के भदौड़ गाँव (जिला संगरूर) में।
रचना-संसार : ‘धरती गाती है’, ‘धीरे बहो गंगा’, ‘बेला फूले आधी रात’, ‘चित्रों में लोरियाँ’, ‘बाजत आवे ढोल’, ‘गिद्धा’, ‘दीवा बले सारी रात’, ‘पंजाबी लोक-साहित विच सैनिक’, ‘मैं हूँ खानाबदोश’, ‘गाए जा हिंदुस्तान’, ‘मीट माई पीपल’ (लोक-साहित्य), ‘चट्टान से पूछ लो’, ‘चाय का रंग’, ‘नए धान से पहले’, ‘सड़क नहीं बंदूक’, ‘घूँघट में गोरी जले’, ‘मिस फोकलोर’, ‘देवेंद्र सत्यार्थी की चुनी हुई कहानियाँ’, ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘कुंगपोश’, ‘सोनागाछी’, ‘देवता डिग पेया’, ‘तिन बुहियाँवाला घर’, ‘पेरिस दा आदमी’, ‘नीली छतरीवाला’, ‘नए देवता’, ‘बाँसुरी बजती रही’ (कहानी-संग्रह), ‘रथ के पहिए’, ‘ब्रह्मपुत्र’, ‘कठपुतली’, ‘दूधगाछ’, ‘कथा कहो उर्वशी’, ‘तेरी कसम सतलुज’, ‘घोड़ा बादशाह’, ‘विदा दीपदान’, ‘सूई बाजार’ (उपन्यास), ‘चाँद-सूरज के बीरन’, ‘नीलयक्षिणी’, ‘हैलो गुडमैन दि लालटेन’, ‘नाच मेरी बुलबुल’ (आत्मकथा), ‘सफरनामा पाकिस्तान’ (यात्रा-वृत्तांत), ‘देवेंद्र सत्यार्थी नब्बे बरस का सफर’, ‘मेरे साक्षात्कार’ (साक्षात्कार)। इसके अलावा बाल साहित्य, अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में बहुत काम किया।
साहित्य सेवा के लिए भारत सरकार द्वारा ‘पद्म श्री’ के अलावा हिंदी अकादमी, दिल्ली समेत अनेक संस्थाओं से सम्मानित।
स्मृतिशेष : 12 फरवरी, 2003।