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बिंदु को अकस्मात् आए अपने इस जीवन के नए धाराप्रवाह का सिरा नहीं मिल रहा था। वह मानो एक तिनके की तरह जीवन की सुनामी में प्रवाहित, स्थापित, विस्थापित और प्रतिस्थापित की जाने वाली थी। उसने बाबा को अपना निर्णय तो सुना दिया था, पर वह जानती थी कि मनुष्य के पास नियति से लड़ने के दो तरीके हैं- एक आदमी कटु हो जाए और अपने तथा दूसरों के जीवन में लगातार कटुता घोले; दूसरा समर्पण, प्रेम और साध्य से अपने तथा सबके जीवन में मिठास घोली जाए, पर साथ ही अपनी जीवन-आशा और जीवन ध्येय को कभी विस्मृत न किया जाए, यही हमारी बिंदु ने किया। उसने शक्कर बाँटी थी, पर साथ ही अपने पढ़ने के सपने को भी जीवित रखा था।