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"यह उपन्यास 'सारे रंग मेरे' नाजरीन अंसारी 'राफी' की छठी पुस्तक है। विधवा स्त्रियों के जीवन से रंग क्यों छीने जाते हैं ? क्यों रंगों की दुनिया से उन्हें अलग किया जाता रहा है? विधवा स्त्रियों की ऐसी अमानवीय दशा को अग्नि क्यों दी जाती रही है? उनके साथ रंगों का इतना भेदभाव क्यों किया जाता रहा है?- ऐसे अनगिनत सवालों का जवाब ढूँढूंढ़ते हुए लेखिका ने अपने अंतर्मन की आवाज की चीत्कार का वर्णन इस उपन्यास में किया है।
इस पुस्तक में विधवा स्त्रियों की मनोदशा को समझने व दरशाने की कोशिश हुई है। विधवा स्त्रियों की विडंबना यह होती है कि बिना किसी पाप के ही लोग उनके मन में हीनभावना भरते हैं। उनकी उस असहनीय दशा को पाठक के समक्ष रखने का प्रयास है।
लेखिका का संदेश है- मैं उन सभी नवयुवती विधवा स्त्रियों से यह कहना चाहती हूँ कि तुम विधवा हो तो क्या हुआ, तुम्हारे लिए हर रंग सिर्फ तुम्हारा है, गहरे हों या हलके, सारे रंगों पर तुम्हारा भी समान अधिकार है। तुम सबसे कह दो और सबसे कहने से पहले स्वयं से यह जरूर कहो- 'सारे रंग मेरे'।"