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"संस्कृत भाषा भारत ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के ज्ञान की वाहक रही है। इसे किसी एक धर्म या देवता के नाम के साथ जोड़कर सीमित कर देना संस्कृत की प्रकृति के साथ अन्याय होगा। विश्व की समस्त भाषाओं में संस्कृत का स्थान प्रमुख है। इसकी व्याकरणिक संरचना, सूक्ष्म अर्थछटा, तार्किक दृष्टि और काव्यात्मक प्रवाह ने गहन चिंतन की अभिव्यक्ति के लिए सर्वथा सक्षम बनाया। इस भाषा की क्षमता को पाणिनि के 'अष्टाध्यायी' में देखा जा सकता है। इसकी तार्किक संरचना आधुनिक कंप्यूटर की प्रोग्रामिंग भाषाओं से साम्य रखती है।
यह ग्रंथ मात्र भाषा के नियमों को ही नहीं सिखाता है, बल्कि मानव मस्तिष्क द्वारा भाषा के प्रसंस्करण के तर्क समझने का नायाब नमूना भी है। न्याय दर्शन में निहित 'प्रमाण' की अवधारणा इसी तार्किक परंपरा की परिणति है। इन साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि संस्कृत एक भाषा ही नहीं, बल्कि बौद्धिक परंपरा का पर्याय है। इस भाषा ने सहस्त्राब्दियों तक ज्ञान को विकसित, परिष्कृत, प्रसारित और संरक्षित करने का कार्य किया है।"